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दारा शिकोह का परिचय
पहचान: मुग़ल शहज़ादा, सूफ़ी विचारक, अनुवादक, धार्मिक सहिष्णुता के समर्थक और “मज्मउल बहरैन” के लेखक
दारा शिकोह का जन्म 20 मार्च 1615 को अजमेर, राजस्थान में हुआ। वे मुग़ल बादशाह शाहजहाँ और मलिका मुमताज़ महल के सबसे बड़े पुत्र तथा मुग़ल सल्तनत के नामज़द उत्तराधिकारी थे। मुग़ल दरबार में उन्हें “शाह-ए-बुलंद इक़बाल” और “पादशाहज़ादा-ए-बुज़ुर्ग मर्तबा” जैसे ख़िताब दिए गए। अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता, व्यापक अध्ययन, सूफ़ियाना मिज़ाज और धार्मिक उदारता के कारण वे दरबार और विद्वानों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे। उनकी बड़ी बहन जहाँआरा बेगम से भी उनका गहरा आध्यात्मिक और बौद्धिक संबंध था।
दारा शिकोह ने फ़ारसी, अरबी, हिंदी और संस्कृत भाषाओं में दक्षता प्राप्त की। उनकी रुचि प्रारंभ से ही दर्शन, सूफ़ीवाद और आध्यात्मिक चिंतन की ओर थी। वे क़ादिरी सिलसिले के सूफ़ियों, विशेषकर मियाँ मीर, मुल्ला शाह बदख्शी और सरमद काशानी से अत्यधिक प्रभावित थे। इसी श्रद्धा के कारण उन्होंने “क़ादिरी” तख़ल्लुस अपनाया और फ़ारसी कविता में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके फ़ारसी दीवान में ग़ज़लें, रुबाइयाँ और क़सीदे शामिल हैं।
दारा शिकोह की सबसे बड़ी पहचान इस्लामी सूफ़ीवाद और हिंदू वेदांत दर्शन के बीच वैचारिक सामंजस्य स्थापित करने की कोशिशों से जुड़ी है। उन्होंने संस्कृत से पचास उपनिषदों का फ़ारसी अनुवाद “सिर्र-ए-अकबर” के नाम से किया, ताकि मुस्लिम विद्वान और फ़ारसी जानने वाले भारतीय दर्शन से परिचित हो सकें। अपनी भूमिका में उन्होंने यह विचार भी व्यक्त किया कि क़ुरआन में वर्णित “किताब-ए-मक़नून” से आशय उपनिषद भी हो सकते हैं।
उनकी प्रसिद्ध कृति “मज्मउल बहरीन” भारतीय उपमहाद्वीप में अंतरधार्मिक बौद्धिक संवाद की एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ मानी जाती है। इस ग्रंथ में उन्होंने सूफ़ीवाद और वेदांत की अवधारणाओं तथा आध्यात्मिक शब्दावली के बीच समानताओं को स्पष्ट किया। इसके अतिरिक्त “सफ़ीनतुल औलिया”, “सकीनतुल औलिया”, “रिसाला-ए-हक़नुमा”, “हसनातुल आरिफ़ीन” और “अक्सीर-ए-आज़म” भी उनकी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
दारा शिकोह कला, चित्रकला, सुलेख और स्थापत्य कला के भी बड़े संरक्षक थे। उनकी सौंदर्यप्रियता का प्रमाण “दारा शिकोह एल्बम” है, जिसमें चित्रकला और सुलेख के दुर्लभ नमूने संग्रहीत हैं। यह एल्बम उन्होंने अपनी पत्नी नादिरा बानो बेगम के लिए तैयार करवाया था। लाहौर में नादिरा बानो बेगम का मक़बरा, मियाँ मीर की दरगाह, दिल्ली की दारा शिकोह लाइब्रेरी और कश्मीर की कुछ इमारतें भी उनकी सरपरस्ती से जुड़ी मानी जाती हैं।
1657 में शाहजहाँ की बीमारी के बाद मुग़ल सल्तनत में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हुआ। दारा शिकोह को अपने भाई औरंगज़ेब का सामना करना पड़ा, जो धार्मिक दृष्टि से अधिक कट्टर और राजनीतिक तथा सैन्य रणनीति में अधिक मज़बूत सिद्ध हुए। कई युद्धों में पराजित होने के बाद दारा शिकोह को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन पर अधर्म तथा धार्मिक विचलन के आरोप लगाए गए।
निधन: 30 अगस्त 1659 को औरंगज़ेब के आदेश पर उनकी हत्या कर दी गई। बाद में उन्हें दिल्ली में हुमायूँ के मक़बरे के परिसर में दफ़न किया गया।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Dara_Shikoh
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