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डॉ. ज़ाकिर हुसैन का परिचय
पहचान: भारत के तीसरे राष्ट्रपति, विद्वान, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी, लेखक, अनुवादक, वक्ता और प्रशासक
डॉ. ज़ाकिर हुसैन एक बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे जिन्होंने भारत के शैक्षिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में असाधारण सेवाएँ दीं। देश के निर्माण और शिक्षा के प्रसार में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्हें भारत का सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” प्रदान किया गया।डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 1897 में हैदराबाद में हुआ, जहाँ उनके पिता फ़िदा हुसैन ख़ान वकालत के सिलसिले में रहते थे। सात भाइयों में वे तीसरे नंबर पर थे। उनके पूर्वज फ़रीदी पठान थे। उनका पैतृक स्थान कायमगंज, ज़िला फ़र्रुख़ाबाद था।
प्रारंभिक शिक्षा घर पर एक अंग्रेज़ ट्यूटर से प्राप्त की। पिता बीमारी के कारण कायमगंज लौट आए और वहीं उनका देहांत हो गया। इसके बाद ज़ाकिर साहब को इस्लामिया हाई स्कूल, इटावा भेजा गया जहाँ से उन्होंने हाई स्कूल पास किया। उसी समय उनकी माता का भी प्लेग की महामारी में देहांत हो गया। युवावस्था में सूफ़ी दरवेश हसन शाह का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा।
एम.ए.ओ. कॉलेज अलीगढ़ से एफ.ए. किया। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया, पर बीमारी के कारण छोड़ना पड़ा। फिर अलीगढ़ लौटकर आर्ट्स विषयों से बी.ए. किया। अर्थशास्त्र में एम.ए. और साथ ही एल.एल.बी. किया। बाद में अर्थशास्त्र विभाग में जूनियर लेक्चरर नियुक्त हुए। वे मेधावी विद्यार्थी, अच्छे वक्ता और विश्व की घटनाओं में रुचि रखने वाले व्यक्ति थे।
1920 में महात्मा गांधी और मौलाना मोहम्मद अली के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए। सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान छोड़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया से जुड़े, जो उस समय अलीगढ़ में स्थापित हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए जहाँ ललित कलाएँ, संगीत, चित्रकला, नाटक और वास्तुकला में रुचि विकसित हुई। यद्यपि उनका विषय अर्थशास्त्र था, पर उनकी विशेष रुचि शिक्षा शास्त्र में थी। जर्मनी के आधुनिक शिक्षण संस्थानों का अध्ययन और अवलोकन किया।
1926 में डॉ. आबिद हुसैन और प्रोफेसर मोहम्मद मजीब के साथ भारत लौटे और जामिया की सेवा में कम वेतन पर स्वयं को समर्पित किया। ये तीनों “अरकान-ए-सलासा” कहलाए। राजनीतिक और आर्थिक संकट के दौर में जामिया को संभाला और शैख़-उल-जामिया के रूप में उसे मज़बूत किया। जामिया को एक आदर्श शिक्षण संस्था बनाने में उनका मूल योगदान रहा।
विभाजन के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी कठिन दौर से गुजर रही थी। नेहरू और मौलाना आज़ाद के आग्रह पर 1948 में वे उसके वाइस चांसलर बने और विश्वविद्यालय की स्थिति सुधारी। 1957 में स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफ़ा दिया। इसके बाद वे बिहार के राज्यपाल, भारत के उपराष्ट्रपति और फिर राष्ट्रपति बने।
उन्होंने गांधीजी की बुनियादी शिक्षा योजना को व्यवस्थित पाठ्यक्रम का रूप दिया। जामिया में प्रारंभिक शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण के क्षेत्र में नए प्रयोग किए। पाठ्य पुस्तकों और बाल साहित्य पर विशेष काम हुआ। मक्तबा जामिया की स्थापना हुई जिसने कम कीमत पर अच्छी किताबें प्रकाशित कीं। बच्चों की पत्रिका “पयाम-ए-तालीम” जारी हुई।
अपनी दिवंगत पुत्री रिहाना रक़िया के नाम से 17 कहानियाँ लिखीं। अन्य कहानियों में: छदू, पूरी जो कड़ाही से निकल भागी, आदमी की कहानी एक सितारे की ज़ुबानी, उक़ाब, अबू ख़ान की बकरी, गुल अब्बास शामिल हैं।
“कछुआ और खरगोश” ऊपर से बच्चों की कहानी लगती है, पर उसमें शैक्षिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रश्नों की झलक मिलती है। अंग्रेज़ी साहित्य से रूपांतरित दो नाटक भी लिखे जो जामिया में मंचित हुए।
उनकी लेखनी में सादगी, गहराई और विचारों की गरमाहट मिलती है। प्रमुख कृतियाँ हैं: फ़िक्र-ए-ज़ाकिर, ज़ाकिर हुसैन यादगारी भाषण, अफ़कार-ए-ज़ाकिर, उच्च शिक्षा, बुनियादी क़ौमी तालीम, हाली मुहिब्ब-ए-वतन, भारत में शिक्षा का पुनर्गठन (अनुवाद), मशाहीर के अव्वलीन सहीफ़े, शैक्षिक भाषण, ज़ाकिर साहब के ख़ुतूत, ज़िक्र-ए-हुसैन, मबादी-ए-मआशियात (अनुवाद), अफ़लातून और रियासत (अनुवाद), अबू ख़ान की बकरी और चौदह कहानियाँ, कछुआ और खरगोश, खोटा सोना और दयानत (नाटक)।
1915 में शाहजहाँ बेगम से विवाह हुआ। उनकी तीन बेटियाँ हुईं: रक़िया रिहाना (बचपन में देहांत), सईदा बेगम (विवाह ख़ुर्शीद आलम ख़ाँ से), सफ़िया बेगम (विवाह प्रोफेसर ज़िलुर्रहमान ख़ाँ से)।
निधन: 3 मई 1969 को दिल्ली में उनका देहांत हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Zakir_Husain
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