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प्रतिष्ठित शायरा

प्रतिष्ठित शायरा

फ़ातिमा हसन

ग़ज़ल 22

नज़्म 9

अशआर 26

क्या कहूँ उस से कि जो बात समझता ही नहीं

वो तो मिलने को मुलाक़ात समझता ही नहीं

ख़्वाबों पर इख़्तियार यादों पे ज़ोर है

कब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में

सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था

वगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था

मैं ने माँ का लिबास जब पहना

मुझ को तितली ने अपने रंग दिए

उलझ के रह गए चेहरे मिरी निगाहों में

कुछ इतनी तेज़ी से बदले थे उन की बात के रंग

लेख 1

 

पुस्तकें 12

वीडियो 16

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ऑडियो 17

आँखों में न ज़ुल्फ़ों में न रुख़्सार में देखें

क्या कहूँ उस से कि जो बात समझता ही नहीं

किस से बिछड़ी कौन मिला था भूल गई

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