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इमाम इबने तैमिया का परिचय
पहचान: शैख़ुल-इस्लाम, महान फ़क़ीह, मुहद्दिस, मुतकल्लिम, हनबली मक्तब-ए-फ़िक्र के प्रमुख व्याख्याकार तथा इस्लाम के विख्यात धर्मशास्त्री (Theologian)
शैख़ुल-इस्लाम तकीउद्दीन अहमद बिन अब्दुल हलीम, जिन्हें दुनिया इब्न तैमिय्या के नाम से जानती है, 22 जनवरी 1263 ई. (661 हिजरी) को हर्रान (वर्तमान तुर्की) में जन्मे। तातारियों के बढ़ते आक्रमणों के कारण उनका परिवार दमिश्क (सीरिया) चला गया। उनका जन्म एक ऐसे विद्वत् परिवार में हुआ जहाँ ज्ञान का समृद्ध वातावरण था। मात्र 20 वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पिता के स्थान पर अध्यापन आरम्भ किया और “बिस्मिल्लाह” की व्याख्या में इतने सूक्ष्म बिंदु प्रस्तुत किए कि उस समय के बड़े-बड़े विद्वान आश्चर्यचकित रह गए।
इमाम इब्न तैमिय्या का सबसे बड़ा योगदान मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों की शुद्धि था। उस समय यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र के प्रभाव ने इस्लामी शिक्षाओं को जटिल बना दिया था। उन्होंने यूनानी दर्शन का विद्वत्तापूर्ण विश्लेषण किया और सिद्ध किया कि क़ुरआन और हदीस की सरल शिक्षाएँ ही मुक्ति का मार्ग हैं।
उन्होंने मज़ारों पर मन्नत माँगने, शिर्क से जुड़ी प्रथाओं और ग़ैर-शरई वसीले के विरुद्ध आवाज़ उठाई तथा बिदअतों के उन्मूलन के लिए व्यावहारिक कदम उठाए। इब्न अरबी के विचारों और वहदतुल-वुजूद के सिद्धांत को उन्होंने क़ुरआन व सुन्नत के विरुद्ध बताया।
इमाम इब्न तैमिय्या केवल कलम के धनी नहीं थे, बल्कि युद्धभूमि के भी साहसी पुरुष थे। जब तातारियों ने शाम पर आक्रमण किया, तो उन्होंने जनता और शासकों को प्रतिरोध के लिए प्रेरित किया। तातारी शासक ग़ाज़ान ख़ान से उनकी भेंट इतिहास का एक उज्ज्वल अध्याय है, जहाँ उन्होंने उसके सामने निर्भीक होकर न्याय और निष्पक्षता का संदेश दिया।
उनका संपूर्ण जीवन सत्यवादिता की कीमत पर परीक्षाओं से भरा रहा। उनकी स्वतंत्र फ़िक़्ही रायों (जैसे तलाक़ और क़ब्रों की ज़ियारत के विषय) के कारण समकालीन विद्वानों और शासकों ने उन्हें कई बार कारावास दिया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिन भी दमिश्क के क़िले में कैद की अवस्था में बिताए।
उन्होंने लगभग 700 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें मिन्हाजुस-सुन्नह, अस-सारिमुल-मसलूल और अक़ीदा वासितिय्या विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। उनके शिष्यों में इमाम इब्न क़य्यिम और हाफ़िज़ इब्न कसीर जैसे महान विद्वान शामिल हैं, जिन्होंने उनके बौद्धिक मिशन को आगे बढ़ाया।
निधन: 26 सितंबर 1328 ई. (20 ज़ुल-क़ादा 728 हिजरी) को दमिश्क के क़िले में कारावास की अवस्था में उनका निधन हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Ibn_Taymiyya
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