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जावेद सिद्दीक़ी का परिचय
जन्म : 13 Jan 1942 | रामपुर, उत्तर प्रदेश
LCCN :no96008470
जावेद सिद्दीक़ी एक प्रसिद्ध स्क्रीन राइटर, नाटककार, संवाद लेखक, रेखाचित्र लेखक और कहानीकार हैं। उनका जन्म 13 जनवरी 1942 को रामपुर के एक ऐसे परिवार में हुआ जहाँ पढ़ने-लिखने का रिवाज ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही था। परिवार में साहित्यकारों, शायरों, वकीलों और डॉक्टरों की भरमार थी। कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने दूर-दूर तक परिवार का नाम रौशन किया, जैसे अली बंधु (मौलाना मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली), जिनके बिना आज़ादी का इतिहास अधूरा है।
जावेद सिद्दीक़ी के परदादा हाफ़िज़ अहमद अली ख़ान ‘शौक़’ इन्हीं बंधुओं के चचेरे भाई थे। वही अहमद अली ख़ान ‘शौक़’ जो नवाब रामपुर के मंत्री और रज़ा लाइब्रेरी के पहले लाइब्रेरियन रहे। जावेद सिद्दीक़ी के पिता शुजाअत अली ने भी रज़ा लाइब्रेरी में असिस्टेंट लाइब्रेरियन के रूप में वर्षों काम किया, बाद में राजनीति में नाम कमाया और हर सच्चे देशभक्त की तरह जेल की कठिनाइयाँ भी झेलीं।
जावेद सिद्दीक़ी 17 वर्ष के थे जब उनके पिता का निधन हुआ और उन्हें मुंबई आना पड़ा। यहाँ चाचा मौलाना ज़ाहिद शौकत अली के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने पारिवारिक अख़बार "ख़िलाफ़त" में पत्रकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने "इंक़लाब" और "हिंदुस्तान" जैसे अख़बारों में काम किया और फिर अपना अख़बार "उर्दू रिपोर्टर" निकाला, जिससे 1975 तक जुड़े रहे।
इमरजेंसी के समय जब पत्रकारिता का दरवाज़ा बंद हुआ तो फिल्मी दुनिया के दरवाज़े खुल गए। 1977 में उन्होंने सत्यजीत-रे की "शतरंज के खिलाड़ी" से फिल्म इंडस्ट्री में अपने महत्वपूर्ण सफ़र की शुरुआत की और भारत के कई प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया। उनके क्रेडिट पर मुज़फ़्फ़र अली की "उमराव जान", दीपक शिवदसानी की "बागी", मणि रत्नम की "अंजलि", यश चौपड़ा की "ये दिल्लगी", धरमेश दर्शन की "राजा हिंदुस्तानी", महेश भट की "चाहत", श्याम बेनिगल की "ज़ुबैदा", सुभाष घई की "ताल", ख़ालिद मोहम्मद की "फ़िज़ा" और राकेश रौशन की "कोई मिल गया" जैसी सफल फ़िल्में शामिल हैं।
जावेद सिद्दीक़ी को अपनी पीढ़ी के सभी बड़े सितारों और अभिनेताओं के लिए लिखने का सम्मान प्राप्त है। शाहरुख़ ख़ान शुरू से ही उन्हें अपने लिए भाग्यशाली मानते रहे हैं। वे उनके साथ "बाज़ीगर", "डर", "परदेस" और "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" जैसी कई शुरुआती हिट फिल्मों में काम कर चुके हैं।
जावेद सिद्दीक़ी ने थिएटर में भी नाम कमाया। "तुम्हारी अमृता", "सालगिरह", "हमेशा", "बेगम जान", "हमसफ़र", "अंधे चूहे", "कच्चे लम्हे", "आप की सोनिया" और "एक सफ़रनामा" जैसे लोकप्रिय मंच नाटक लिखे और निर्देशित किए।
फिल्म और थिएटर के अलावा जावेद सिद्दीक़ी ने उर्दू साहित्य को भी समृद्ध किया है। उन्होंने रेखाचित्र, कहानियाँ और रेखाचित्र-सदृश रचनाएँ लिखीं। साहित्य प्रेमियों ने इन रेखाचित्रों को बहुत पसंद किया और इतना उत्साह बढ़ाया कि एक पुस्तक प्रकाशित हुई जिसका नाम "रौशनदान" रखा गया। सराहना का सिलसिला बढ़ा तो दो और संग्रह "लंगर-ख़ाना" और "उजाले" भी प्रकाशित हुए। अब इन तीनों को मिला कर "मेरे मोहतरम" के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पाकिस्तान में इस संग्रह को "बुक कॉर्नर" ने प्रकाशित किया।
जब उन्होंने कहानियाँ लिखीं तो पहला संग्रह "मुट्ठी भर कहानियाँ" के नाम से प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक का शीर्षक और कवर पेंटिंग दोनों गुलज़ार साहब की देन हैं। "मोर पंखी" उनका दूसरा और नवीनतम कहानी संग्रह है।
जावेद सिद्दीकी को चार बार "लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड" से सम्मानित किया जा चुका है। "बाज़ीगर", "दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे" और "राजा हिंदुस्तानी" जैसी फिल्मों में उनके संवाद और स्क्रीनप्ले के लिए उन्हें दो "फिल्मफेयर अवॉर्ड" और "स्टार स्क्रीन अवॉर्ड" मिल चुके हैं। इसके अलावा "उमराव जान" के लिए "बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवॉर्ड" भी प्राप्त हुआ। 2001 में रेडियो और टीवी से जुड़ाव पर "ऑल इंडिया अवॉर्ड" मिला। 2006 में उन्हें हिंदी सिनेमा में योगदान के लिए "सहारा अवध सम्मान" दिया गया। 2007 में ग़ालिब इंस्टिट्यूट दिल्ली की ओर से "हम सब ग़ालिब पुरस्कार" मिला। उत्तर प्रदेश अकादमी लखनऊ ने "रौशनदान" को 2011 की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक का सम्मान दिया। 2021 में आर्ट्स काउंसिल ऑफ पाकिस्तान, कराची ने "मुट्ठी भर कहानियाँ" को विशेष सराहना दी।संबंधित टैग
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