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Mohammad Manzoor Nomani's Photo'

मोहम्मद मंज़ूर नोमानी

1905 - 1997 | लखनऊ, भारत

प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान, हदीस विशेषज्ञ, लेखक और पत्रिका 'अल-फुरकान' के संस्थापक

प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान, हदीस विशेषज्ञ, लेखक और पत्रिका 'अल-फुरकान' के संस्थापक

मोहम्मद मंज़ूर नोमानी का परिचय

जन्म : 15 Dec 1905 | संभल, उत्तर प्रदेश

निधन : 04 May 1997 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

पहचान: प्रतिष्ठित इस्लामी विद्वान, हदीस विशेषज्ञ, लेखक और पत्रिका 'अल-फुरकान' के संस्थापक।

 

मौलाना मुहम्मद मंज़ूर नोमानी का जन्म 15 दिसंबर 1905 को उत्तर प्रदेश के शहर संभल में हुआ। उनके पिता सूफ़ी मुहम्मद हुसैन एक सम्मानित व्यापारी और ज़मींदार थे। प्रारम्भिक शिक्षा अपने क्षेत्र के मदरसा सिराजुल उलूम हिलाली सराय, संभल में प्राप्त की। बाद में दारुल उलूम मऊ, आज़मगढ़ में अरबी शिक्षा हासिल की। उच्च धार्मिक शिक्षा के लिए दारुल उलूम देवबंद में दाख़िला लिया, जहाँ केवल दो वर्षों में फ़ाज़िलियत की शिक्षा पूरी की और 1927 में दौर-ए-हदीस की परीक्षा में विशेष योग्यता के साथ सफलता प्राप्त की।

शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने तीन वर्षों तक अमरोहा में अध्यापन किया। इसके बाद अबुल हसन अली नदवी के आग्रह पर दारुल उलूम नदवतुल उलेमा, लखनऊ में अध्यापन से जुड़े और लगभग चार वर्षों तक सेवा दी।

मौलाना मंज़ूर नोमानी ने 1934 में बरेली से मासिक पत्रिका अल-फ़ुरक़ान जारी की, जो बाद में लखनऊ से प्रकाशित होने लगी। आरम्भ में यह एक शैक्षिक और वैचारिक पत्रिका थी, लेकिन बाद में धार्मिक, सुधारवादी और मस्लकी विषयों की महत्वपूर्ण प्रतिनिधि बन गई। उनकी लेखनी में तर्क, धार्मिक संवेदनशीलता, वैचारिक गहराई और सरल शैली स्पष्ट दिखाई देती है।

वे जमाअत-ए-इस्लामी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। 1941 में संगठन की स्थापना के समय अबुल आला मौदूदी को अमीर चुनने वाली समिति में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और स्वयं नायब अमीर चुने गए। बाद में संगठन के केंद्र दारुल इस्लाम, पठानकोट से भी जुड़े और वहाँ पहले मुहतसिब नियुक्त हुए, लेकिन वैचारिक और संगठनात्मक मतभेदों के कारण 1942 में जमाअत-ए-इस्लामी से अलग हो गए। इन मतभेदों और अपने दृष्टिकोण को उन्होंने अपनी पुस्तक “मौलाना मौदूदी के साथ मेरी रिफ़ाक़त की सरगुज़श्त और अब मेरा मौक़िफ़” में विस्तार से लिखा।

जमाअत-ए-इस्लामी से अलग होने के बाद वे और अबुल हसन अली नदवी, तबलीगी जमाअत और उसके संस्थापक मुहम्मद इलियास कांधलवी से जुड़ गए। उन्होंने “मलफ़ूज़ात-ए-मौलाना मुहम्मद इलियास” के नाम से उनके कथनों और उपदेशों को संकलित किया, जिसे तबलीगी हलकों में विशेष महत्व प्राप्त है।

1943 में मौलाना मंज़ूर नोमानी दारुल उलूम देवबंद की मजलिस-ए-शूरा के सदस्य चुने गए। बाद में वे मजलिस-ए-आमिला की बैठकों में भी लगातार भाग लेते रहे। वे राबिता आलम-ए-इस्लामी के सदस्य भी थे।

मौलाना मंज़ूर नोमानी ने दीनियात, हदीस, अक़ीदों, तसव्वुफ़, फ़िक़्ह, मुनाज़रों और समकालीन वैचारिक विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रसिद्ध कृति “मआरिफ़ुल हदीस” उर्दू में हदीस-ए-नबवी की अत्यंत लोकप्रिय, सरल और प्रामाणिक व्याख्या मानी जाती है। इसके अतिरिक्त “इस्लाम क्या है”, “दीन व शरीअत”, “कुरआन आप से क्या कहता है”, “तसव्वुफ़ क्या है”, “कलिमा-ए-तैय्यिबा की हक़ीक़त”, “नमाज़ की हक़ीक़त”, “बरकात-ए-रमज़ान”, “तहक़ीक़ मसअला-ए-ईसाल-ए-सवाब” और “आप हज कैसे करें” जैसी पुस्तकें भी अत्यंत लोकप्रिय हुईं।

उन्होंने समकालीन धार्मिक और वैचारिक आंदोलनों पर भी गहरी दृष्टि रखी। “ईरानी इंक़िलाब, इमाम ख़ुमैनी और शीयत”, “शिया सुन्नी इख़्तिलाफ़ात”, “क़ादियानी क्यों मुसलमान नहीं”, “शैख़ मुहम्मद बिन अब्दुल वह्हाब के ख़िलाफ़ प्रोपेगंडा और हिंदुस्तान के उलेमा-ए-हक़ पर उसके असरात” तथा “इस्लाम और कुफ्र के हुदूद” जैसी पुस्तकों में उन्होंने विभिन्न धार्मिक और वैचारिक विषयों पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

निधन: मौलाना मुहम्मद मंज़ूर नोमानी का निधन 4 मई 1997 को लखनऊ में हुआ।

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