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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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मुबारक शमीम

1924 - 2007 | शाहजहाँपुर, भारत

भारत में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उर्दू ग़ज़ल की सौंदर्यपरक परंपरा को जीवित रखने वाले शायरों में शामिल

भारत में बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में उर्दू ग़ज़ल की सौंदर्यपरक परंपरा को जीवित रखने वाले शायरों में शामिल

मुबारक शमीम के शेर

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क्या ख़बर कब क़ैद-ए-बाम-ओ-दर से उक्ता जाए दिल

बस्तियों के दरमियाँ सहरा भी होना चाहिए

जो साया-दार शजर थे वो सर्फ़-ए-दार हुए

दिखाई देते नहीं दूर दूर तक साए

उस को धुँदला सकेगा कभी लम्हों का ग़ुबार

मेरी हस्ती का वरक़ यूँही खुला रहने दे

बोल किस मोड़ पे हूँ कश्मकश-ए-मर्ग-ओ-हयात

ऐसे आलम में कहाँ छोड़ दिया है मुझ को

नज़र आती नहीं हैं कम-नज़र को

सराबों के जिगर में नद्दियाँ हैं

मुद्दत गुज़री डूब चुका हूँ दर्द की प्यासी लहरों में

ज़िंदा हूँ ये कोई जाने साँस के आने जाने से

क्या तमाशा है कि अब हर शख़्स को ये वहम है

सब से मैं ऊँचा हूँ मुझ से कोई भी ऊँचा नहीं

हर इक पत्थर को हीरा क्यों समझ लें

हर इक पत्थर अगरचे दीदनी है

हुआ क्या नसीम-ए-सुब्ह-गाही

जो मुरझाया हुआ दिल का कँवल है

दीदा-ए-बेनूर इक आलम है क्या ये झूट है

हर तरफ़ फैला हुआ है तीरगी का सिलसिला

जी यही कहता है अब चल के वहीं जा ठहरो

हम ने वीरानों में देखे हैं वो आसार कि बस

तुम्हारी याद के साए भी कुछ सिमट से गए

ग़मों की धूप तो बाहर थी अक्स अंदर था

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