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नसीरुद्दीन हाश्मी का परिचय
उपनाम : 'नसीरुद्दीन हाश्मी'
मूल नाम : नसीरुद्दीन अब्दुल बारी
जन्म : 15 Mar 1895 | हैदराबाद, तिलंगाना
निधन : 26 Sep 1964 | हैदराबाद, तिलंगाना
LCCN :n2014211235
पहचान: दकनियत के विशेषज्ञ, प्रतिष्ठित शोधकर्ता, इतिहासकार, पांडुलिपि-विशेषज्ञ और उर्दू के प्रसिद्ध साहित्यकार
नसीरुद्दीन हाशमी, जिनका मूल नाम मुहम्मद नसीरुद्दीन अब्दुलबारी था, 15 मार्च 1895 (17 रमज़ान 1312 हिजरी) को रियासत हैदराबाद दकन के मोहल्ला तरप बाज़ार में जन्मे। उन्हें “माहिर-ए-दकनियत” माना जाता है, क्योंकि दकनी साहित्य, भाषा और संस्कृति का शायद ही कोई ऐसा पक्ष हो जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। उनकी शाहकार कृति “दकन में उर्दू” ने उर्दू भाषा के विकास को समझने के लिए नए आयाम खोले।नसीरुद्दीन हाशमी का संबंध अरबी-वंशीय नवाइत परिवार से था, जो लगभग एक हज़ार वर्ष पूर्व इराक़ व हिजाज़ से पश्चिमी भारत आया था। यह परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी शाही पदों, क़ज़ा (न्यायिक पदों) और क़िलेदारी जैसी प्रतिष्ठित सेवाओं पर आसीन रहा। उनके पूर्वजों ने गोवा में क़ाज़ी, औरंगज़ेब के दौर में सरहोट के क़िलेदार तथा अर्काट में दीवानी सेवाएँ निभाईं। प्रशासनिक दायित्वों के साथ यह परिवार सदैव शिक्षा, लेखन और विद्वत्ता का केंद्र रहा।
उनके दादा मौलवी ग़ुलाम मुहम्मद (दीवान-ए-नवाब अर्काट) की सेवाएँ सर सालार जंग अव्वल हैदराबाद प्राप्त करना चाहते थे, किंतु उनके स्थान पर उनके पुत्र और नसीरुद्दीन हाशमी के पिता मौलवी अब्दुल क़ादिर 1869 में हैदराबाद आए। वे रियासत के रजिस्ट्रार-ए-बल्दिया के पद पर कार्यरत रहे। नसीरुद्दीन हाशमी अपने पिता की चौथी संतान थे। उनकी माता उम्मतुल क़ादिर बद्रुन्निसा स्वयं एक लेखिका थीं, जिन्होंने “गुलज़ार-ए-औलिया” जैसी पुस्तक संकलित की।
नसीरुद्दीन हाशमी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई, जहाँ उन्होंने दीनियात, उर्दू, फ़ारसी, गणित और सुलेख सीखा। पिता के निधन के बाद वे मदरसा दारुल उलूम हैदराबाद में प्रविष्ट हुए और मुंशी व मौलवी आलिम की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। वहीं उन्हें प्रसिद्ध कवि व चिंतक अमजद हैदराबादी की शिष्यता प्राप्त हुई, जिनसे उन्होंने इतिहास, दर्शन, अरबी और गणित का अध्ययन किया। बाद में मद्रास विश्वविद्यालय से मुंशी फ़ाज़िल की परीक्षा उत्तीर्ण की और उस्मानिया विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी सहित मैट्रिक तक शिक्षा पूर्ण की।
उन्हें अध्ययन और शोध से असाधारण लगाव था। उन्होंने उपन्यास, यात्रा-वृत्तांत, इतिहास, जीवनी और पांडुलिपियों का व्यापक अध्ययन किया। नौकरी के सिलसिले में वे रियासत हैदराबाद के विभिन्न प्रशासनिक और रिकॉर्ड विभागों से जुड़े रहे और लगभग इकतीस वर्ष तक सरकारी सेवा की। सेंट्रल रिकॉर्ड ऑफिस तथा रजिस्ट्रेशन व स्टाम्प विभाग में कार्य करते हुए उन्हें प्राचीन दस्तावेज़ों, सरकारी रिकॉर्ड और दुर्लभ पांडुलिपियों तक पहुँच मिली, जिसने उनके शोध को नई दिशा दी।
उनकी विद्वतापूर्ण ख्याति का मुख्य कारण उर्दू और दकनी भाषा-साहित्य पर उनका मौलिक शोध है। उनकी प्रसिद्ध कृति “दकन में उर्दू” उर्दू भाषा के इतिहास और दकन में उसके विकास पर प्रारंभिक प्रामाणिक ग्रंथों में गिनी जाती है, जबकि “यूरोप में दकनी पांडुलिपियाँ” एक अद्वितीय शोधकार्य है जिसमें उन्होंने यूरोप के पुस्तकालयों में सुरक्षित दकनी पांडुलिपियों का परिचय दिया। इन्हीं सेवाओं के सम्मान में उन्हें एक वर्ष के लिए इंग्लैंड भेजा गया, जहाँ उन्होंने इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और फ़्रांस के पुस्तकालयों से दुर्लभ सामग्री संकलित की।
उन्होंने उर्दू भाषा, दकनी साहित्य, महिलाओं की साहित्यिक सेवाओं, दकन के इतिहास, संस्कृति, शिक्षण संस्थानों, पांडुलिपियों और व्यक्तित्व-लेखन पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी प्रमुख कृतियों में दकन में उर्दू, यूरोप में दकनी मख्तूतात, मद्रास में उर्दू, ख़वातीन-ए-दकन की उर्दू सेवाएँ, आज का हैदराबाद, दकनी हिंदू और उर्दू, दकनी कल्चर, मक़ालात-ए-हाशमी, तारीख़ अतियात-ए-आसफ़ी, अहद-ए-आसफ़ी की क़दीम तालीम, रहबर-ए-सफ़र-ए-यूरोप, कुतुबख़ाना सालारजंग की व्याख्यात्मक सूची और कुतुबख़ाना आसफ़िया के उर्दू मख्तूतात शामिल हैं।
उनकी लेखनी का विशेष गुण शोध-निष्ठा, स्रोत-आधारित अध्ययन, ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक दृष्टि है। उन्होंने उर्दू शोध को पारंपरिक तज़किरा-लेखन से निकालकर दस्तावेज़ी और अकादमिक आधार प्रदान किया। दकनी साहित्य और दक्षिण भारत की उर्दू परंपरा के अध्ययन में उनका कार्य आज भी मूल स्रोत की हैसियत रखता है।
निधन: 26 सितंबर 1964 को हैदराबाद में उनका देहांत हुआ।
सहायक लिंक : | https://ur.wikipedia.org/wiki/%D9%86%D8%B5%DB%8C%D8%B1_%D8%A7%D9%84%D8%AF%DB%8C%D9%86_%DB%81%D8%A7%D8%B4%D9%85%DB%8C
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