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क़मर रईस का परिचय
इक नूह नहीं जो हमें कश्ती में बिठा ले
वर्ना किसी तूफ़ान के आसार तो सब हैं
पहचान: प्रख्यात आलोचक, शोधकर्ता, प्रेमचंद विशेषज्ञ, शायर और प्रगतिशील विचारधारा के प्रतिनिधि साहित्यकार
क़मर रईस (मूल नाम: मुसाहिब अली ख़ाँ) का जन्म 12 जुलाई 1932 को मोहल्ला अहमदपुरा, शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका संबंध एक विद्वान और साहित्यिक परिवार से था। उनके पिता का नाम मौलवी अब्दुल अली ख़ाँ और माता का नाम मुख़्तार बेगम था, जबकि उनकी पत्नी का नाम रईस बानो था।
क़मर रईस ने प्रारंभिक शिक्षा मिशन हाई स्कूल, शाहजहाँपुर से प्राप्त की। 1948 में हुसैनाबाद गवर्नमेंट हाई स्कूल, लखनऊ से मैट्रिक, 1950 में गांधी फ़ैज़-ए-आम कॉलेज, शाहजहाँपुर से इंटरमीडिएट, फिर आगरा विश्वविद्यालय से 1952 में बी.ए. और लखनऊ विश्वविद्यालय से 1954 में एल.एल.बी. की डिग्री प्राप्त की। बाद में नागपुर विश्वविद्यालय से 1955 में उर्दू में एम.ए. किया। 1958 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से “प्रेमचंद का आलोचनात्मक अध्ययन बतौर उपन्यासकार” विषय पर पीएचडी पूरी की, जो प्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर रशीद अहमद सिद्दीकी के निर्देशन में लिखी गई।
1959 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में लेक्चरर नियुक्त हुए और बाद में रीडर, प्रोफेसर तथा विभागाध्यक्ष के पदों पर रहे। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय में विज़िटिंग प्रोफेसर के रूप में भी सेवाएँ दीं।
क़मर रईस ताशकंद में पाँच वर्षों तक इंडियन कल्चरल सेंटर के निदेशक रहे। वे पाँच बार “अंजुमन-ए-असातिज़ा-ए-उर्दू जामिआत” के जनरल सेक्रेटरी चुने गए। इसके अलावा अठारह वर्षों तक “अंजुमन तरक़्क़ी पसंद मुसन्निफ़ीन” के जनरल सेक्रेटरी रहे। वे पहले उर्दू प्रोफेसर थे जिन्हें यूजीसी ने “नेशनल लेक्चरर” के सम्मान से नवाज़ा। 2001 में ताशकंद विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद पीएचडी की उपाधि भी प्रदान की।
क़मर रईस उर्दू साहित्य में प्रगतिशील और मार्क्सवादी आलोचना के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि माने जाते हैं। यद्यपि उनकी सबसे बड़ी पहचान प्रेमचंद विशेषज्ञ के रूप में है, लेकिन उन्होंने सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को भी अपनी आलोचना का केंद्र बनाया। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि में समाजवाद, मानवीय स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक सौहार्द के विचार प्रमुख हैं। उन्होंने प्रगतिशील साहित्य को केवल राजनीतिक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया।
क़मर रईस केवल आलोचक ही नहीं बल्कि शायर भी थे। उनका काव्य-संग्रह “शाम-ए-नौरोज़” विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें चिंतनशील नज़्में और ग़ज़लें शामिल हैं।
उनके संपादन में कई महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ प्रकाशित हुईं, जिनमें “माहनामा अदीब” (अलीगढ़), “सह-माही आब-ओ-गुल” (दिल्ली), “माहनामा असरी आगाही” और “नया सफ़र” शामिल हैं।
क़मर रईस की महत्वपूर्ण पुस्तकों में “प्रेमचंद का आलोचनात्मक अध्ययन”, “प्रेमचंद: फ़िक्र ओ फ़न”, “प्रेमचंद बतौर उपन्यासकार”, “तनक़ीदी तनाज़ुर”, “ताबीर ओ तहरील”, “तलाश ओ तवाज़ुन”, “उर्दू में बीसवीं सदी का अफ़सानवी अदब”, “तरजुमा का फ़न और रिवायत”, “उर्दू अदब में तंज़ ओ मज़ाह की रिवायत” और “उज़्बेकिस्तान: इंक़लाब से इंक़लाब तक” शामिल हैं।
संपादन और संकलन के क्षेत्र में भी उनकी सेवाएँ महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने “तरक़्क़ी पसंद अदब: पचास साल का सफ़र”, “जोश मलीहाबादी: विशेष अध्ययन”, “नया अफ़साना: मसाइल और मीलानात”, “मुआसिर उर्दू ग़ज़ल: मसाइल व मीलानात”, “मज़ामीन-ए-प्रेमचंद” और “मुंशी प्रेमचंद: शख्सियत और कारनामे” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन किया।
अनुवाद के क्षेत्र में “बीसवीं सदी की उज़्बेक शायरी”, “अरमग़ान-ए-ताशकंद” और “नग़्मा-ए-कश्मीर” विशेष उल्लेखनीय हैं, जिनके माध्यम से उन्होंने उर्दू पाठकों को मध्य एशिया की संस्कृति, कविता और बौद्धिक परंपरा से परिचित कराया।
निधन: क़मर रईस का निधन 29 अप्रैल 2009 को दिल्ली में हुआ।
सहायक लिंक : | https://ur.wikipedia.org/wiki/%D9%82%D9%85%D8%B1_%D8%B1%D8%A6%DB%8C%D8%B3
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