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राही मासूम रज़ा

1927 - 1992 | अलीगढ़, भारत

अग्रणी हिंदी उपन्यासकार और फ़िल्म संवाद-लेखक , टी. वी. सीरियल ' महाभारत ' के संवादों के लिए प्रसिद्ध

अग्रणी हिंदी उपन्यासकार और फ़िल्म संवाद-लेखक , टी. वी. सीरियल ' महाभारत ' के संवादों के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 11

नज़्म 15

शेर 5

इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई

हम सोए रात थक कर सो गई

हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें

हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं

ये चराग़ जैसे लम्हे कहीं राएगाँ जाएँ

कोई ख़्वाब देख डालो कोई इंक़िलाब लाओ

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पुस्तकें 13

Aadha Gaon

 

2003

अजनबी शहर अजनबी रास्ते

 

1965

Atthara Sau Sattawan

 

1960

फ़न और शख़्सियत

क़तील शिफ़ाई नम्बर: शुमारा नम्बर-013,014

1982

ग़रीब-ए-शहर

 

1992

Ghreeb-e-shahr

 

2001

Naya Saal

 

1952

रक़्स-ए-मय

 

1960

तिलिस्म-ए-होशोरुबा एक मुताला

 

1979

Tilsim-e-Hoshruba Ek Mutala

 

1979

चित्र शायरी 9

हम तो हैं परदेस में देस में निकला होगा चाँद अपनी रात की छत पर कितना तन्हा होगा चाँद जिन आँखों में काजल बन कर तैरी काली रात उन आँखों में आँसू का इक क़तरा होगा चाँद रात ने ऐसा पेँच लगाया टूटी हाथ से डोर आँगन वाले नीम में जा कर अटका होगा चाँद चाँद बिना हर दिन यूँ बीता जैसे युग बीते मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद

हम क्या जानें क़िस्सा क्या है हम ठहरे दीवाने लोग उस बस्ती के बाज़ारों में रोज़ कहें अफ़्साने लोग यादों से बचना मुश्किल है उन को कैसे समझाएँ हिज्र के इस सहरा तक हम को आते हैं समझाने लोग कौन ये जाने दीवाने पर कैसी सख़्त गुज़रती है आपस में कुछ कह कर हँसते हैं जाने पहचाने लोग फिर सहरा से डर लगता है फिर शहरों की याद आई फिर शायद आने वाले हैं ज़ंजीरें पहनाने लोग हम तो दिल की वीरानी भी दिखलाते शरमाते हैं हम को दिखलाने आते हैं ज़ेहनों के वीराने लोग उस महफ़िल में प्यास की इज़्ज़त करने वाला होगा कौन जिस महफ़िल में तोड़ रहे हों आँखों से पैमाने लोग

आओ वापस चलें रात के रास्ते पर वहाँ नींद की बस्तियाँ थीं जहाँ ख़ाक छानीं कोई ख़्वाब ढूँडें कि सूरज के रस्ते का रख़्त-ए-सफ़र ख़्वाब है और इस दिन के बाज़ार में कल तलक ख़्वाब कमयाब था आज नायाब है

 

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