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शकीलुर्रहमान का परिचय
पहचान: प्रतिष्ठित आलोचक, सौंदर्यशास्त्री (एस्थेटीशियन), कहानीकार, पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और पूर्व कुलपति।
उर्दू साहित्य की दुनिया में शकील-उर-रहमान की हैसियत एक ऐसे बहुमुखी विद्वान और आलोचक की है, जिन्होंने "सौंदर्यपरक आलोचना" (जमालियाती तनक़ीद) को उर्दू में एक नया और मज़बूत मुक़ाम दिया। उनका जन्म 18 फरवरी 1931 को मोतिहारी, बिहार में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए. और डी.लिट. की डिग्रियां हासिल कीं। उनका शैक्षणिक और शिक्षण करियर बहुत शानदार रहा; वह कश्मीर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे, इसके अलावा उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर) और कश्मीर विश्वविद्यालय के कुलपति (वाइस चांसलर) के रूप में भी सेवाएं दीं। उनके व्यक्तित्व का एक पहलू राजनीतिक भी था, जिसमें उन्होंने संसदीय चुनाव जीता और भारत सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की ज़िम्मेदारी संभाली, हालांकि राजनीति की व्यस्तता उन्हें साहित्य और ज्ञान की दुनिया से दूर न कर सकी।
हालाँकि शकील-उर-रहमान ने अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत कहानी लेखन से की थी और "समुंदर का सफर" नामक एक उपन्यास भी लिखा था, लेकिन उनकी असली पहचान एक आलोचक, विशेष रूप से "सौंदर्यशास्त्र के आलोचक" के रूप में स्थापित हुई। उन्होंने उर्दू आलोचना को मनोवैज्ञानिक और सौंदर्यपरक दृष्टिकोणों से परिचित कराया। उनकी किताबों की सूची काफी लंबी है, जिनमें 'अदब और नफ़सियात', 'ग़ालिब की जमालियात', 'इक़बाल और फुनून-ए-लतीफ़ा', 'मंटो शनासी', 'मीर शनासी' और 'मौलाना रूमी की जमालियात' जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें शामिल हैं। अख्तर-उल-ईमान की शायरी पर उनका अध्ययन 'लावे का समुंदर' उर्दू आलोचना में एक अहम स्थान रखता है। ग़ालिब के "आर्केटाइपल पैटर्न" पर उनकी पुस्तक उर्दू में अपनी तरह की पहली कोशिश मानी जाती है। उन्होंने हिंद-इस्लामी और हिंद-मुगल सौंदर्यशास्त्र पर काम करके उपमहाद्वीप की साझा संस्कृति और ललित कलाओं के रचनात्मक रिश्तों को उजागर किया।
उनकी शैक्षणिक सेवाओं के सम्मान में उन्हें एक "लीजेंड" और अनूठी साहित्यिक हस्ती माना जाता है। उन्होंने सौंदर्यशास्त्र को अपनी आलोचना का मुख्य केंद्र बनाया और इस क्षेत्र में अपना एक अलग रास्ता निकाला। उनके लेखन में चेतन और अवचेतन की चर्चा और कलाकृतियों का सौंदर्यपरक विश्लेषण पाठक को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। उर्दू के विद्वानों के बीच उन्हें एक ऐसे विशिष्ट लेखक के रूप में याद किया जाएगा, जिन्होंने आलोचना को केवल नीरस बहस तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे ललित कलाओं की सुंदरता के साथ जोड़ दिया।
निधन: शकील-उर-रहमान का निधन 9 मई 2016 को गुड़गांव, हरियाणा में हुआ।
सहायक लिंक : | https://en.wikipedia.org/wiki/Shakeelur_Rehman
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