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शिबली नोमानी

1857 - 1914 | आज़मगढ़, भारत

उर्दू आलोचना के संस्थापकों में शामिल/महान इतिहासकार, स्कालर, राजनैतिक चिंतक और फ़ारसी शायर/अपने ग्रंथ ‘शेर-उल-अजम के लिए प्रसिद्ध

उर्दू आलोचना के संस्थापकों में शामिल/महान इतिहासकार, स्कालर, राजनैतिक चिंतक और फ़ारसी शायर/अपने ग्रंथ ‘शेर-उल-अजम के लिए प्रसिद्ध

आप जाते तो हैं उस बज़्म में 'शिबली' लेकिन

हाल-ए-दिल देखिए इज़हार होने पाए

मैं रूह-ए-आलम-ए-इम्काँ में शरह-ए-अज़्मत-ए-यज़्दाँ

अज़ल है मेरी बेदारी अबद ख़्वाब-ए-गिराँ मेरा

अजब क्या है जो नौ-ख़ेज़ों ने सब से पहले जानें दीं

कि ये बच्चे हैं इन को जल्द सो जाने की आदत है

तस्ख़ीर-ए-चमन पर नाज़ाँ हैं तज़ईन-ए-चमन तो कर सके

तसनीफ़ फ़साना करते हैं क्यूँ आप मुझे बहलाने को

जम्अ कर लीजिए ग़ैरों को मगर ख़ूबी-ए-बज़्म

बस वहीं तक है कि बाज़ार होने पाए

फ़राज़-ए-दार पे भी मैं ने तेरे गीत गाए हैं

बता ज़िंदगी तू लेगी कब तक इम्तिहाँ मेरा

ये नज़्म-ए-आईं ये तर्ज़-ए-बंदिश सुख़नवरी है फ़ुसूँ-गरी है

कि रेख़्ता में भी तेरे 'शिबली' मज़ा है तर्ज़-ए-'अली-हज़ीं' का