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सुदर्शन का परिचय
पहचान: प्रसिद्ध कथाकार, नाटककार, अनुवादक और भारतीय सिनेमा के प्रारंभिक दौर के प्रमुख पटकथा लेखक
पंडित सुदर्शन भारतीय उपमहाद्वीप के उन महान साहित्यकारों में गिने जाते हैं जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक परंपरा को आगे बढ़ाया और उसे नई दिशा दी।
उनका वास्तविक नाम पंडित बद्रीनाथ शर्मा था और उनका जन्म 1896 में सियालकोट के एक संपन्न जमींदार परिवार में हुआ। उन्होंने साहित्य में बी.ए. की डिग्री प्राप्त की, जिसने उनके बौद्धिक जीवन की मजबूत नींव रखी।
सुदर्शन ने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत लाहौर की प्रसिद्ध उर्दू पत्रिका ‘हज़ार दास्तान’ से की। उन्हें मुंशी प्रेमचंद के समकक्ष कथाकार माना जाता है, क्योंकि उनकी रचनाओं में सादगी, मानवीय संवेदना और जीवन की सच्चाई झलकती है। उनकी पहली कहानी ‘हार की जीत’ (1920) ने उन्हें व्यापक ख्याति दिलाई। यह कहानी एक किसान की नैतिक विजय की कथा है, जो अपने प्रिय घोड़े को एक डाकू से बचाने का प्रयास करता है। उनके कथानकों का दायरा शहर से लेकर गांव तक फैला हुआ है, जहां वे मध्यम वर्ग के भावनात्मक जीवन को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
जहाँ मुंशी प्रेमचंद सिनेमा में अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सके, वहीं पंडित सुदर्शन ने इस माध्यम में उल्लेखनीय सफलता हासिल की। बोलती फिल्मों के दौर में वे कलकत्ता चले गए और शीघ्र ही बड़े फिल्म स्टूडियो की जरूरत बन गए।
उनकी पहली फिल्म ‘रामायण’ थी, जिसमें पृथ्वीराज कपूर ने अभिनय किया। इसके बाद उन्होंने ‘न्यू थिएटर्स’ के साथ कई उत्कृष्ट फिल्में लिखीं। 1935 में फिल्म ‘धूप छाँव’ के लिए उन्होंने न केवल पटकथा लिखी बल्कि उसके सभी 10 गीत भी लिखे। उनका गीत “तेरी गठरी में लगा चोर, मुसाफिर जाग ज़रा” आज भी क्लासिक माना जाता है। मुंबई आने के बाद उन्होंने सोहराब मोदी की प्रसिद्ध फिल्म ‘सिकंदर’ के संवाद और पटकथा लिखकर इतिहास रच दिया।
पंडित सुदर्शन ने हिंदी और उर्दू दोनों भाषाओं में महत्वपूर्ण साहित्यिक योगदान दिया:
कहानी संग्रह: कुंज-ए-आफियत, कुदरत के खेल, पारस, चटखियां, सदा बहार, तहज़ीब के ताज़ियाने आदि।
नाटक: औरत की मोहब्बत, महाभारत, मोहब्बत का इंतकाम, क़ौमपरस्त।
फिल्म लेखन: पृथ्वी वल्लभ, पत्थरों का सौदागर, जलतरंग, फिर मिलेंगे।
अनुवाद: दयानंद प्रकाश।उनकी रचनाएं इतनी प्रभावशाली थीं कि महात्मा गांधी भी उनके प्रशंसकों में शामिल थे। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्होंने फिर से पुस्तकों और पत्रिकाओं के लिए लेखन शुरू किया, जहाँ उनके विषय ग्रामीण जीवन से शहरी समस्याओं की ओर मुड़ गए।
निधन: 16 दिसंबर 1967 को मुंबई के हरकिशन दास अस्पताल में उनका निधन हुआ।
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