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सय्यद आबिद हुसैन का परिचय
मूल नाम : आबिद हुसैन
जन्म : 25 Jul 1896 | कन्नौज, उत्तर प्रदेश
पुरस्कार : साहित्य अकादमी अवार्ड(1956)
पहचान: प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी, दार्शनिक, अनुवादक, शिक्षाविद् और पत्रकार
सैयद आबिद हुसैन बीसवीं सदी के उन प्रमुख भारतीय चिंतकों में गिने जाते हैं जिन्होंने दर्शन, शिक्षा, अनुवाद, सांस्कृतिक अध्ययन और साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सेवाएँ दीं। दरवेशाना विनम्रता, बौद्धिक गंभीरता और विद्वतापूर्ण ईमानदारी उनके व्यक्तित्व की विशेष पहचान थी। वे उन विचारकों में थे जिन्होंने आधुनिक शिक्षा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान के विमर्श को ठोस बौद्धिक आधार प्रदान किया।
सैयद आबिद हुसैन का जन्म 25 जुलाई 1896 को भोपाल में हुआ। उनका पैतृक संबंध जिला कन्नौज के गाँव दाईपुर से था। उनके पूर्वज सैयद हसन बंदगी तिरमिज़ से भारत आए थे और दाईपुर में बस गए थे। उनके पिता सैयद हामिद हुसैन रियासत भोपाल की सेवा में थे। प्रारंभिक शिक्षा व्यवस्थित नहीं रही; कुछ समय भोपाल के जहांगिरिया स्कूल में पढ़े, फिर 1912 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में हाई स्कूल पास किया। इंटर साइंस से किया, लेकिन रुझान दर्शन की ओर रहा। बीए में दर्शन, अंग्रेज़ी और फ़ारसी लेकर उत्कृष्ट सफलता प्राप्त की और 1919 में विश्वविद्यालय में प्रथम आए।
एमए दर्शन के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण पढ़ाई प्रभावित हुई। उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए, आर्थिक कठिनाइयों के कारण जर्मनी चले गए जहाँ शिक्षा अपेक्षाकृत सस्ती थी। पिता ने वज़ीफ़ा फिर से जारी कराया। जर्मनी में उनकी मित्रता डॉ. ज़ाकिर हुसैन और मोहम्मद मजीब से रही। 1925 में बर्लिन विश्वविद्यालय से दर्शन में पीएचडी की। शोध का विषय था: “Herbert Spencer’s Theory of Education in the Light of His Philosophy.”
जर्मनी में रहते हुए हकीम अजमल ख़ाँ और डॉ. अंसारी के प्रोत्साहन पर तीनों मित्र 1926 में भारत लौटे और जामिया मिल्लिया इस्लामिया की सेवा स्वीकार की। ये तीनों “अरकान-ए-सलासा-ए-जामिया” कहलाए। आबिद हुसैन जामिया में उर्दू और अंग्रेज़ी पढ़ाते रहे, जामिया कॉलेज के प्रिंसिपल और कोषाध्यक्ष भी रहे। पत्रिका जामिया के संपादक तथा बच्चों की पत्रिका पयाम-ए-तालीम के संस्थापक और संपादक थे।
उनका मूल क्षेत्र दर्शन था, पर सांस्कृतिक इतिहास, विशेषकर भारतीय संस्कृति में गहरी रुचि थी। जर्मन भाषा पर असाधारण अधिकार था, अंग्रेज़ी में दक्षता और फ़ारसी का भी ज्ञान था। वे उर्दू से प्रेम को भारतीय संस्कृति से प्रेम मानते थे।
अनुवाद उनका सबसे बड़ा क्षेत्र था। वे उर्दू के शीर्ष अनुवादकों में माने जाते हैं। उन्होंने लगभग चौबीस महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद किया। प्रमुख अनुवादों में शामिल हैं:
तलाश-ए-हिंद (नेहरू की Discovery of India)
मुक़ालमात-ए-अफलातून
गोएथे का फ़ाउस्ट और विल्हेम माइस्टर
टैगोर का चोखेर बाली (कलमुँही)
गांधी की आत्मकथा तलाश-ए-हक़
नेहरू की आत्मकथा मेरी कहानी
बर्नार्ड शॉ की सेंट जोन
डॉ. ज़ाकिर हुसैन की शैक्षिक रचनाओं के अनुवाद
उन्होंने उर्दू स्टैंडर्ड डिक्शनरी (संपादक मौलवी अब्दुल हक़) के पुनरीक्षण का बड़ा कार्य किया। साप्ताहिक नई रोशनी और पत्रिका इस्लाम और अस्र-ए-जदीद के संस्थापक एवं संपादक रहे। सात वर्ष तक आकाशवाणी में उर्दू के साहित्यिक सलाहकार रहे। भाषा आयोग में उर्दू के प्रतिनिधि के रूप में शामिल रहे।
उनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में शामिल हैं:
कौमी तहज़ीब का मसला, हिंदुस्तानी क़ौमियत और क़ौमी तहज़ीब, मुसलमान और जामिया मिल्लिया, मज़ामीन-ए-आबिद, पर्दा-ए-ग़फ़लत (नाटक), शरीर लड़का (नाटक), बज़्म-ए-बेतकल्लुफ़, हिंदुस्तानी मुसलमान आईना-ए-अय्याम में, गांधी और नेहरू की राह।1933 में उनका विवाह ख़्वाजा ग़ुलामुस्सैयदीन की बेटी और मौलाना हाली की परनातिन मिस्दाक फ़ातिमा से हुआ, जो सालिहा आबिद हुसैन के नाम से प्रसिद्ध लेखिका और शोधकर्ता थीं। उनकी पहली शादी छात्र जीवन में अपनी चचेरी बहन से हुई थी जो सफल नहीं रही।
उन्हें 1957 में पद्म भूषण और दिल्ली सरकार का सरस्वती सम्मान मिला।
निधन: 13 दिसंबर 1978 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।
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