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सय्यद हाशमी फ़रीदाबादी का परिचय
पहचान: उपमहाद्वीप के विख्यात इतिहासकार, अनुवादक, कवि और अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू के सक्रिय सदस्य।
सैयद हाशमी फरीदाबादी का जन्म 30 जनवरी 1890 को दिल्ली के निकट फरीदाबाद के एक प्रतिष्ठित सादात परिवार में हुआ था। उनके पिता नवाब सैयद अहमद शफी दिल्ली के गणमान्य व्यक्तियों में गिने जाते थे, जबकि उनकी माता लोहारू रियासत के शासक नवाब अलाई की पुत्री थीं। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बी.ए. किया। अलीगढ़ में पढ़ाई के दौरान बाल्कन युद्ध के अवसर पर उन्होंने जोशीली कविताएँ लिखीं, जिनमें से "बाल्कन चल, बाल्कन चल" अत्यंत लोकप्रिय हुई। इसी राजनीतिक और राष्ट्रीय गतिविधि के कारण उन्हें कॉलेज से निकाल दिया गया, जिसके बाद उन्होंने स्वयं को उर्दू साहित्य के लिए समर्पित कर दिया।
हाशमी साहब ने 1917 में हैदराबाद रियासत में नौकरी शुरू की। वे उस्मानिया विश्वविद्यालय के 'दारुल तर्जुमा' (अनुवाद विभाग) के उन पहले छह अनुवादकों में शामिल थे, जिन्हें इतिहास विभाग के लिए नियुक्त किया गया था। उन्होंने दारुल तर्जुमा में 17 वर्षों (1917 से 1934) तक अनुवादक के रूप में सेवाएँ दीं और इस दौरान कई पुस्तकों का अनुवाद और लेखन किया। पुस्तकों की संख्या के मामले में उन्हें दारुल तर्जुमा का दूसरा सबसे बड़ा अनुवादक माना जाता है। बाद में वे सहायक सचिव (गृह और न्याय विभाग) के पद पर भी कार्यरत रहे।
मौलवी अब्दुल हक़ (बाबा-ए-उर्दू) के साथ उनका साथ 40 वर्षों तक रहा। उन्होंने अंजुमन के लिए औरंगाबाद, दिल्ली और विभाजन के बाद कराची में अभूतपूर्व सेवाएँ दीं। वे अंजुमन के संयुक्त सचिव, 'उर्दू' पत्रिका के संपादक और 'क़ौमी ज़बान' के पर्यवेक्षक रहे। हाशमी साहब मौलवी अब्दुल हक़ के इस हद तक दाहिने हाथ थे कि बाबा-ए-उर्दू उनके परामर्श के बिना कोई काम नहीं करते थे। हालाँकि, जीवन के अंतिम वर्षों में कुछ कारणों से मौलवी साहब उनसे रुष्ट हो गए, जिसके बाद हाशमी साहब चुपचाप लाहौर चले गए।
हाशमी फरीदाबादी एक विशिष्ट गद्य लेखक और इतिहासकार थे। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:
तारीख़-ए-मुसलमान-ए-पाकिस्तान व भारत: दो खंडों में यह पुस्तक पाठ्यक्रम का हिस्सा बनी।
तारीख़-ए-मिल्लत-ए-अरबी: फिलिप हिट्टी की प्रसिद्ध पुस्तक "History of the Arabs" का बेहतरीन उर्दू अनुवाद।
पंजाह साला तारीख़ अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू: अंजुमन के पचास वर्षों के शैक्षणिक और साहित्यिक संघर्ष का पूरा विवरण।
मआसिर-ए-लाहौर: लाहौर के पुरातात्विक अवशेषों पर एक प्रामाणिक पुस्तक।
सह नज़्म-ए-हाशमी: उनका संक्षिप्त कविता संग्रह।
हाशमी साहब एकांत प्रिय और प्रसिद्धि से दूर रहने वाले व्यक्ति थे। उनकी बातचीत विद्वत्तापूर्ण और आकर्षक होती थी। लाहौर जाने के बाद वे पंजाब विश्वविद्यालय के 'दाइरा मुआरिफ-ए-इस्लामिया' (इस्लामी विश्वकोश) और 'इदारा-ए-सक़ाफ़त-ए-इस्लामिया' से जुड़े रहे।
निधन: 19 जुलाई 1964 को लाहौर में उनका देहांत हुआ।
प्राधिकरण नियंत्रण :लाइब्रेरी ऑफ कॉंग्रेस नियंत्रण संख्या : n82047011
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