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वहाब अशरफ़ी का परिचय
पहचान: शोधकर्ता, आलोचक, पत्रकार, इतिहासकार, कथाकार
प्रोफेसर वहाब अशरफ़ी का जन्म बिहार के जहानाबाद ज़िले (पूर्व में गया) के क़स्बे बीबीपुर (काको) में हुआ। जन्मतिथि को लेकर कुछ मतभेद रहे हैं, लेकिन उनके हाई स्कूल प्रमाणपत्र में 2 जून 1936 दर्ज है, जिसे उन्होंने स्वयं सही माना है। यह इलाका लंबे समय से शिक्षा और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है और यहां स्थित बीबी कमालो के मजार के कारण भी इसकी विशेष पहचान है।
वहाब अशरफ़ी उर्दू साहित्य की एक बहुआयामी और प्रभावशाली शख़्सियत थे। साहित्य से उनका गहरा जुड़ाव इस बात से स्पष्ट होता है कि वे एक साथ शोधकर्ता, उत्कृष्ट आलोचक, पत्रकार, इतिहासकार, शिक्षक और कथाकार थे। भारत की आज़ादी के बाद उर्दू आलोचना को नई सोच और दिशा देने वालों में उनका नाम विशेष महत्व रखता है। उन्होंने किसी एक विचारधारा या स्कूल से बंधकर नहीं लिखा, बल्कि स्वतंत्र, खुले और संतुलित दृष्टिकोण के साथ आलोचना की، जो उनकी पहचान बन गई।
उन्होंने अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत पत्रकारिता से की। कोलकाता में रहते हुए वे अस्र-ए-जदीद, अल-हक़ और अख़ुव्वत जैसे अख़बारों से जुड़े रहे। गया से प्रकाशित पत्रिकाओं आहंग और मोरचा में भी उन्होंने काम किया। बाद में वे पत्रिका सनम के संपादक रहे, जिसने कम समय में विशेष पहचान बनाई। पटना से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका मुबहिसा उनके संपादन में जीवन के अंतिम दिनों तक निकलती रही और युवा लेखकों तथा कवियों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बनी।
वहाब अशरफ़ी ने शुरुआत में कविता लिखी، बाद में कहानी लेखन की ओर आए। उन्होंने लगभग 42 कहानियाँ लिखीं، जिनके दो संग्रह प्रकाशित हुए। लेकिन शीघ्र ही उनका मुख्य ध्यान साहित्यिक आलोचना पर केंद्रित हो गया، और यही उनका प्रमुख क्षेत्र बन गया। उनकी पहली आलोचनात्मक पुस्तक क़ुत्ब-ए-मुश्तरी: एक आलोचनात्मक अध्ययन (1967) थी। इसके बाद क़दीम साहित्यिक आलोचना (1973), मसनवियात-ए-मीर का आलोचनात्मक अध्ययन (1981) और मसनवी और मसनवियात जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
उनके निबंध-संग्रहों में मानी की तलाश, आगाही का मंज़रनामा, उर्दू फ़िक्शन और तीसरी आँख, हर्फ़ हर्फ़ आशना, मानी से मुसाफ़हा, मानी की जिबलत और मानी का मसला शामिल हैं, जिनमें शास्त्रीय और आधुनिक साहित्य, कथा, कविता और आलोचना के प्रमुख मुद्दों पर चर्चा की गई है। इसके अलावा पूर्वी और पश्चिमी आलोचना, मार्क्सवादी दर्शन और समाजवाद तथा मानी की समझ और परे-ए-आईना जैसी पुस्तकों ने उर्दू आलोचना को वैचारिक रूप से और समृद्ध किया।
शोध और संदर्भ ग्रंथों के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान सात खंडों में प्रकाशित तारीख़-ए-अदबियात-ए-आलम (1991–2005) है, जिसमें विश्व की प्रमुख भाषाओं के साहित्य का विस्तृत परिचय दिया गया है। इसके बाद तीन खंडों में तारीख़-ए-अदब-ए-उर्दू (2007) प्रकाशित हुई, जिसे उर्दू साहित्य का अब तक का सबसे आधुनिक और प्रमाणिक इतिहास माना जाता है। इसी कृति पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
आत्मकथा के रूप में उनकी पुस्तक क़िस्सा बे-सिम्त ज़िंदगी का विशेष महत्व रखती है। छात्रों के लिए लिखी गई पुस्तकें कहानी के रूप, नक़ूश-ए-अदब और तफ़हीम-ए-बालाग़त तथा उनकी पाठ्य-पुस्तकें उनकी गहरी शिक्षण दृष्टि को स्पष्ट करती हैं۔
प्रोफेसर वहाब अशरफ़ी का निधन 15 जुलाई 2012 को पटना में हुआ।
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