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अक्लमंद दर्जी

वक़ार मोहसिन

अक्लमंद दर्जी

वक़ार मोहसिन

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    गर्मियों की एक तपती दोपहर में जब सूरज आग बरसा रहा था और लू के थपेड़े सूखे पत्तों को बगूलों की शक्ल में उड़ा रहे थे, फज़लू अपने आम के बाग़ में तोतों को उड़ाने में मशग़ूल था। शरीर तोते हरे-हरे पत्तों में छुपे चोरी-चोरी आम कुतर रहे थे। फज़लू मिट्टी का ढेला रस्सी की ग़ुलील में रख घुमाता और दरख़्त की तरफ़ उछाल देता। तोतों का ग़ोल टें-टें करता भर्रा मार कर उड़ता और किसी दूसरे दरख़्त पर जा बैठता। हर तरफ़ सन्नाटा था सिर्फ़ मस्जिद के पीछे वाली पनचक्की की फ़क़-फ़क़ की आवाज़ रही थी। वो कुछ देर के लिए जामुन के दरख़्त की छाओं में सुस्ताने के लिए बैठ गया। अभी उसने बाँसुरी जेब से निकाल कर होंटों से लगाई ही थी कि सामने कुकुरवंदों की झाड़ियों में से एक ख़ूँ-ख़्वार चीता बरामद हुआ। चीते ने क़रीब कर बड़े दोस्ताना अंदाज़ में फज़लू से कहा, “क्यों भाई फज़लू क्या हाल हैं? इस बार तो तुम्हारे बाग़ में ख़ूब बहार आई हुई है।”

    चीते को देख कर फज़लू की सिट्टी गुम हो गई और उसके होंटों से बाँसुरी फिसल कर घास पर गिर गई और उसने सिटपिटा कर कहा, “शुक्र है जनाब। बस अल्लाह का करम है।”

    “दोस्त ज़रा जल्दी करो। मेरे लंच का वक़्त है। वो सामने जो दो बैल बंधे हैं उनमें से सफ़ेद वाला ले आओ। उसका गोश्त यक़ीनन लज़ीज़ होगा।”

    पहले तो फज़लू की जान में जान आई कि जंगल के बादशाह की उस पर बुरी नज़र नहीं है। इसके बाद उसने कुछ सोच कर इल्तिजा की, “हुज़ूर ये बैल तो मेरी रोटी-रोज़ी का सहारा हैं। इसके बग़ैर में खेती कैसे करूँगा।”

    “भई हमसे ये फ़ुज़ूल बातें मत करो। ये तुम्हारा मुआमला है। जल्दी बैल नहला कर लाओ इतने मैं पंजे और दाँत तेज़ कर लूँ।”

    “जो हुक्म सरकार, लेकिन आप यक़ीन करें कि इस बूढ़े बैल के मुक़ाबले में मेरी गाय का गोश्त बहुत नर्म और लज़ीज़ होगा। अगर आप कहें तो मैं घर से गाय खोल लाऊँ।” फज़लू ने काँपते हुए कहा।

    “अच्छा तो फिर दौड़ता हुआ जा और फटाफट आ। सोच ले अगर देर हुई तो मैं तेरे दोनों बैलों को हड़प कर जाऊँगा।” शेर दहाड़ा...

    फज़लू सीधा अपने दोस्त शरफ़ू दर्ज़ी के पास गया। शरफ़ू सिर्फ़ बहुत ज़हीन था बल्कि फज़लू से उसकी गहरी दोस्ती भी थी। फज़लू ने अपने दोस्त को पूरी कहानी सुनाते हुए तजवीज़ माँगी कि कैसे भूके चीते से पीछा छुड़ाया जाए।

    शरफ़ू थोड़ी देर तक अपने गंजे सर पर दो उंगलियों से तबला बजाता रहा और फिर बोला, “ठीक है दोस्त। तुम फ़िक्र करो मैं कुछ बंद-ओ-बस्त करता हूँ।”

    शरफ़ू ने अलमारी में से सफ़ेद लट्ठे के दो थान निकाले। कपड़ा ज़मीन पर बिछा कर उसने काटना शुरू किया और दस मिनट में दस फुट लंबा एक पायजामा तैयार कर लिया। इसके बाद उसने अपने छप्पर से दो बाँस निकाले और फज़लू से कहा कि वो ये बाँस रस्सी से अच्छी तरह अपने पैरों में बाँध ले। इसके बाद शरफ़ू ने वो पाएजामा बाँसों और फज़लू के पैरों पर चढ़ा दिया। जब फज़लू दीवार का सहार लेकर खड़ा हुआ तो उसका क़द पंद्रह फिट हो चुका था और शरफ़ू उसके सामने बौना लग रहा था। फज़लू लेट कर दरवाज़े से निकला और बाग़ की तरफ़ चल दिया। रास्ते में लोग हैरत से उसको मुड़-मुड़ कर देख रहे थे। फज़लू ने सर पर एक बड़ा पग्गड़ बाँधा हुआ था और वो हुंकारता हुआ जा रहा था।

    “अरे मुझे भूक लग रही है। बहुत दिन हो गए किसी चीते का गोश्त नहीं खाया। दो दिन पहले एक शेर खाया था लेकिन मज़ा नहीं आया।”

    बाग़ की मेंढ़ पर भूक से बिलबिलाते चीते ने देखा कि एक देव नुमा मख़लूक़ उसे खाने के लिए बेचैन है तो वो दुम दबा कर भाग निकला।

    जिस तरह इन्सानों को एक एक ख़ुशामदी की ज़रूरत होती है जो उसकी झूटी तारीफ़ करता रहे उसी तरह गीदड़ झगड़ालू, चीते का ख़ास चमचा था जो हर वक़्त उसकी ख़ुशामद में लगा रहता ताकि चीते की झूटी हड्डियाँ उसे मिल सकें। गीदड़ झगड़ालू जामुन के दरख़्त के नीचे छिपा ये सारा माजरा देख रहा था। चीते को दुम दबा कर भागता देख कर उसने चीते को रोक कर कहा, “हुज़ूर आप कहाँ भागे जा रहे हैं। फज़लू ने आपको बेवक़ूफ़ बनाया है। ये भूत नहीं फज़लू का दोस्त शरफ़ू दर्ज़ी है। उसने आपको डराने के लिए भेस बदला है।”

    “मुझे मालूम है तू झूटा है। तू मुझे उस भूत के हवाले कर के चम्पत हो जाएगा।” चीते ने ग़ुस्से से कहा।

    “हुज़ूर अगर आप मुझे झूटा समझते हैं तो मेरी दुम अपनी दुम से बाँध लें ताकि आपकी मुसीबत के वक़्त मैं भाग सकूँ।”

    ये सुन कर चीते को इत्मेनान हुआ और उसने अपनी दुम गीदड़ झगड़ालू की दुम से बाँध ली और वापस बाग़ का रुख़ किया। शरफ़ू ने गीदड़ और चीते को खुसर-पुसर करते हुए देख लिया था और उसने ताड़ लिया था कि चीता वापस कर हमला करने की कोशिश करेगा। शरफ़ू जल्दी से नीम के दरख़्त पर लगे शहद की मक्खियों के छत्ते के नज़दीक गया और ज़ोर से उस पर हाथ मारा। शहद की मक्खियाँ उसके चेहरे पर लिपट गईं और डंक मारने शुरू कर दिए। शरफ़ू ने क़रीब रखी चूने की बाल्टी से चौंका निकाल कर अपने चेहरे पर मिल लिया। उसे मालूम था कि चूना शहद की मक्खियों के काटे का फ़ौरी ईलाज है। अब उसका चेहरा सूज कर ग़ुब्बारा हो गया था और चूना लगने की वजह से बहुत भयानक लग रहा था। चीते और गीदड़ को अपनी तरफ़ आता देख शरफ़ू ने कहा, “शाबाश गीदड़ मियाँ, तुम हमारे साथ मिल कर चीते को बाँध कर लाने में कामयाब हो गए हम तुम्हें खाने के बाद ईनाम देंगे।”

    चीते ने जो क़रीब कर शरफ़ू को देखा तो वो उसे भूत समझ कर काँप गया। उसको गीदड़ पर भी बहुत ग़ुस्सा रहा था जो उसको फाँस कर वापस लाया था। चीता डर कर भाग खड़ा हुआ। क्योंकि गीदड़ उसकी दुम से बंधा हुआ था इसलिए वो भी गड्ढों, काँटों में घिसटता जा रहा था, एक पत्थर से टकरा कर वो चीते की दुम से अलग हुआ और पानी से भरे एक गहरे गड्ढे में जा गिरा।

    फज़लू की जान में जान आई और उसे अक़्लमंद और मेहरबान दोस्त को गले लगाने के लिए जामुन के दरख़्त पर चढ़ना पड़ा।

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