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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

1911 - 1984 | लाहौर, पाकिस्तान

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे

सबसे प्रख्यात एवं प्रसिद्ध शायर। अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई साल कारावास में रहे

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के स्कॉलर

फ़ैज़ की ग़ज़ल का बुनियादी उसूल: कैफ़ियत, मज़मून-आफ़रीनी और क्लासिकी शेरियात

फ़ैज़ की शायरी का अस्ली हुस्न रिवायती अलामतों (प्रतीकों) के सियासी इस्तेमाल में नहीं, बल्कि 'कैफ़ियत' और 'मज़मून-आफ़रीनी' की उस क्लासिकी रिवायत में है जो उनके बिना-अलामत वाले अशआर में भी साफ़ नज़र आती है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का मानियाती निज़ाम (अर्थ-तंत्र): क्लासिकी शब्दावली में इंक़िलाब की रूह

यह लेख इस बात पर चर्चा करता है कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने किस तरह क्लासिकी ग़ज़ल की पुरानी शब्दावली को नए सामाजिक और राजनीतिक मानी देकर एक अनोखा अर्थ-तंत्र बनाया।

रात, तन्हाई और चाँदनी: फ़ैज़ की शायरी का बुनियादी जमालियाती (सौंदर्यवादी) मूड

यह लेख फ़ैज़ की शायरी में रात, चाँदनी और तन्हाई के चित्रण का विश्लेषण करता है, जो उनके कलाम में एक ख़ास और गहरा सौंदर्यवादी माहौल पैदा करता है।

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और क्लासिकी अलामात (प्रतीकों) का नया रूप: एक तनक़ीदी मुग़ालता (भ्रम)

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के मुताबिक़, फ़ैज़ की महानता सिर्फ़ क्लासिकी अल्फ़ाज़ को नए सियासी मानी पहनाने में नहीं छिपी है, बल्कि यह दावा उनकी शायरी की समझ को महदूद (सीमित) करता है।

क्या फ़ैज़ की शायरी वक़्त के साथ पुरानी हो जाएगी?

यह लेख इस सवाल का जवाब देता है कि क्या फ़ैज़ की सियासी शायरी वक़्त गुज़रने के साथ अपनी अहमियत खो देगी, और यह साफ़ करता है कि उनका सौंदर्यबोध (जमालियाती रचाव) उन्हें अमर बनाता है।

उर्दू शायरी की रिवायत की संरचना और फ़ैज़ की अर्थगत त्रयी

इस लेख में संरचनावादी आलोचना के हवाले से उर्दू शायरी की तीन अर्थगत सतहों (आशिक़ाना, सूफ़ियाना और सियासी) का जायज़ा लिया गया है और बताया गया है कि फ़ैज़ ने किस तरह रिवायती प्रतीकों (अलामतों) को इंक़िलाबी मानी दिए।

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