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फ़ानी बदायुनी

1879 - 1941 | बदायूँ, भारत

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में शामिल, शायरी के उदास रंग के लिए विख्यात।

अग्रणी पूर्व-आधुनिक शायरों में शामिल, शायरी के उदास रंग के लिए विख्यात।

फ़ानी बदायुनी

ग़ज़ल 95

नज़्म 1

 

अशआर 92

इक मुअम्मा है समझने का समझाने का

ज़िंदगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का

हर नफ़स उम्र-ए-गुज़िश्ता की है मय्यत 'फ़ानी'

ज़िंदगी नाम है मर मर के जिए जाने का

सुने जाते थे तुम से मिरे दिन रात के शिकवे

कफ़न सरकाओ मेरी बे-ज़बानी देखते जाओ

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ना-उमीदी मौत से कहती है अपना काम कर

आस कहती है ठहर ख़त का जवाब आने को है

ज़िक्र जब छिड़ गया क़यामत का

बात पहुँची तिरी जवानी तक

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क़ितआ 2

 

रुबाई 3

 

पुस्तकें 33

चित्र शायरी 7

 

वीडियो 14

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ऑडियो 34

अब लब पे वो हंगामा-ए-फ़रियाद नहीं है

आँख उठाई ही थी कि खाई चोट

आह अब तक तो बे-असर न हुई

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