संपूर्ण
परिचय
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ई-पुस्तक88
टॉप 20 शायरी 20
चित्र शायरी 21
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गेलरी 6
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फ़िराक़ गोरखपुरी के लेख
ग़ज़ल क्या है
ग़ज़ल से पहले क़सीदे ने जन्म लिया। क़सीदा किसी आदमी या किसी और विषय पर लगातार शेरों में क़ाफ़िया और रदीफ़ की पाबंदी के साथ होता था। बहुत से क़सीदों में सिर्फ़ क़ाफ़िया होता था, रदीफ़ नहीं होती थी। शायरी की यह विधा अरबी शायरी से फ़ारसी में आई और फ़ारसी
ग़ज़ल की शेअरियात: फ़िराक़ और अहमद मुश्ताक़ का मुहाकिमा
मेज़बान: हमीद क़ैसर, सुहैल अहमद ज़ैदी रिपोर्ट: अहमद महफ़ूज़ शायद 1986 की बात है कि जनाब हमीद क़ैसर के घर पर इदारा-ए-फ़न-ओ-अदब, इलाहाबाद की एक ख़ास बैठक आयोजित हुई। इसके आयोजन की एक ख़ास वजह थी। फ़िराक़ साहब का इंतिक़ाल 1982 में हो चुका था और उनकी याद
उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़
(रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी, 1896 ई. से 1982 ई.) फ़िराक़ साहब की मौजूदा इज़्ज़त और शोहरत को देखते हुए उनके बारे में कोई मतभेद की बात कहना बर्र के छत्ते को छेड़ने जैसा है। मैं अपने बचाव में यही कह सकता हूँ कि मैं यह काम फ़िराक़ साहब के जीवन में भी
उर्दू ग़ज़ल की टेक्निक
कला कोई भी हो, उसमें तकनीक या निर्माण के नियम या भेद, सांचा-ढांचा या बनावट का गुर या बेल-बूटे के नक़्शे, उसकी नोक-पलक के भेद, उसकी गढ़न, उसका रूप-रंग या रचाव और निखार की परत-दर-परत मंज़िलें ज़रूर होती हैं, लेकिन ग़ज़ल के ट्रेड सीक्रेट (व्यापारिक रहस्य)
उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़, पस-नविश्त
कोई ढाई-तीन साल हुए जब मैंने अपना लेख "उर्दू ग़ज़ल की रिवायत और फ़िराक़" कराची के "नया दौर" में छपने के लिए भेजा तो जमील जालबी ने मुझसे कहा कि लेख छप तो जाएगा लेकिन इसके छपने के बाद जो हंगामा उठेगा और लेख के बारे में जो कुछ लिखा जाएगा, उसका सामना करने
इश्क़िया शायरी की परख
यौन या कामुक भावनाओं का शेर में इज़हार आमतौर पर इश्क़िया शायरी समझा जाता है। लेकिन जिस तरह कोयले को हीरा नहीं समझा जाता (हालाँकि कोयला ही एक लंबे अरसे में सूरज की चमक और तपिश को अपने अंदर जज़्ब करके हीरा बन जाता है), उसी तरह कामुक या यौन जज़्बा जब तक
एक सवाल के कई जवाब
उर्दू, हिंदू-मुसलमानों की साझी ज़बान है। हिंदुस्तान के जिस हिस्से की बोली उर्दू है, उस हिस्से की उर्दू आबादी मुसलमान आबादी से बहुत ज़्यादा है। लेकिन इसका क्या कारण है कि अब तक गद्य और पद्य में जितने मुसलमान उर्दू अदीब (साहित्यकार) गुज़रे, उनके मुक़ाबले
शेर-ओ-शायर
हर आदमी को हर पल बेशुमार बातें या चीज़ें चेतन (शऊरी) लेकिन ज़्यादातर अवचेतन (तहत-उश-शऊरी) तौर पर प्रभावित करती रहती हैं। फिर चेतन प्रभाव भी अवचेतन में उतर आते हैं। अवचेतन इन्हीं प्रभावों के बिखराव की एक दुनिया (आलम-ए-इंतशार) है। इन प्रभावों का हज़म होना
फ़िराक़-गोरखपुरी: कहाँ का दर्द भरा था तेरे फ़साने में
फ़िराक़ गोरखपुरी हमारे युग के उन शायरों में से थे जो सदियों में पैदा होते हैं। उनकी शायरी में ज़िंदगी और कायनात (ब्रह्मांड) के रहस्य भरे संगीत से हम-आहंग (तालमेल बिठाने) की अजीबोगरीब कैफ़ियत थी। इसमें एक ऐसा हुस्न, ऐसा रस और ऐसी लताफ़त (कोमलता) थी जो