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मज़ाक़ बदायूनी

1819 - 1894 | बदायूँ, भारत

क्लासिकी शायरों में शामिल, दाग़ देहलवी और अमीर मीनाई के हमअस्र, ग़ज़लों के अलावा हम्द-ओ-नात भी दीवान में शामिल

क्लासिकी शायरों में शामिल, दाग़ देहलवी और अमीर मीनाई के हमअस्र, ग़ज़लों के अलावा हम्द-ओ-नात भी दीवान में शामिल

मज़ाक़ बदायूनी

ग़ज़ल 6

अशआर 5

हम से वहशी नहीं होने के गिरफ़्तार कभी

लोग दीवाने हैं ज़ंजीर लिए फिरते हैं

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ज़बाँ पर आह रही लब से लब कभू न मिला

तिरी तलब तो मिली क्या हुआ जो तू न मिला

सात आसमाँ की सैर है पर्दों में आँख के

आँखें खुलीं तो तुर्फ़ा तमाशा नज़र पड़ा

वाइज़ बुतों के आगे न फ़ुरक़ाँ निकालिए

सूरत से उन की मअ'नी-ए-क़ुरआँ निकालिए

निकल गया मिरी आँखों से मिस्ल-ए-ख़्वाब-व-ख़याल

गुज़र गया दिल-ए-रौशन से वो नज़र बन कर

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