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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नाजी शाकिर

1690 - 1744 | दिल्ली, भारत

नाजी शाकिर के शेर

उस के रुख़्सार देख जीता हूँ

आरज़ी मेरी ज़िंदगानी है

न सैर-ए-बाग़ न मिलना न मीठी बातें हैं

ये दिन बहार के ऐ जान मुफ़्त जाते हैं

बुलंद आवाज़ से घड़ियाल कहता है कि ऐ ग़ाफ़िल

कटी ये भी घड़ी तुझ उम्र से और तू नहीं चेता

ज़ुल्फ़ क्यूँ खोलते हो दिन को सनम

मुख दिखाया है तो न रात करो

सिवाए गुल के वो शोख़ अँखियाँ किसी तरफ़ को नहीं हैं राग़िब

तो बर्ग-ए-नर्गिस उपर बजा है लिखूँ जो अपने सजन कूँ पतियाँ

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