निवेश साहू के शेर
रोने लगे तो कौन हमें चुप कराएगा
सो इस की एहतियात है हम रो नहीं रहे
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होश में आते ही हो जाते हैं चुप
और बे-होशी में चिल्लाते हैं हम
अगर होता तो ख़ुद को फिर बनाता
मगर अफ़्सोस कूज़ा-गर नहीं हूँ
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अपने आँगन में परिंदे देख कर
जिस्म की टहनी से उड़ जाते हैं हम
तुम को अफ़सोस तुम्हें ठीक बनाया न गया
और इक हम कि अभी चाक पे रक्खे न गए
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ये गिला है कि हारता भी नहीं
बीच में खेल छोड़ देता हूँ
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इस जंगल के पेड़ों से मैं वाक़िफ़ हूँ
गिर जाते थे जिस पर साया करते थे
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इक सदा आसमाँ से आती है
और मैं ध्यान तक नहीं देता
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सोचता हूँ कि तुझ को मुझ से कोई
हादिसा ही बचा के ले जाए
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ज़िंदा रहा तो कौन सा ज़िंदा रहूँगा मैं
मर भी गया तो कौन सा मैं मर ही जाऊँगा
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हटा ली वक़्त रहते आँख क़िस्सा-गो की आँखों से
मुझे उस की कहानी पर भरोसा होने वाला था
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ज़ख़्म हरे रहते हैं देखा-देखी में
और नज़र-अंदाज़ी में भर जाते हैं
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निहायत भले तजरिबा-कार अहल-ए-वफ़ा चुन लिए हैं
हमारी सुहूलत से हम ने हमारे ख़ुदा चुन लिए हैं
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क्या है कि हम उस को कभी पूरे नहीं पड़ते
हम ही नहीं कर पाते हैं भरपाई हमारी
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