पाशा रहमान के शेर
इस नगरी में 'पाशा' साहब किस को समझाओगे
हर इक की अपनी डफ़ली हर इक का अपना राग
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वो एक शख़्स जो महफ़िल में बोलता था बहुत
सुना है अहल-ए-नज़र से वो खोखला था बहुत
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