सैफ़ इरफ़ान
ग़ज़ल 9
अशआर 10
तेरे हाथों ने जो थामा है किसी और का हाथ
मेरी आँखों को यही एक नज़ारा दुख है
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अब लोग लिख रहे हैं मोहब्बत की दास्तान
मलबे से मेरे उस की निशानी निकाल कर
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जहाँ से 'सैफ़' हमें कुछ नज़र नहीं आता
वहीं से रास्ता अक्सर हमारा बनता है
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ये देखने के लिए उस ने फिर से तोड़ दिया
कि कैसे टूटा हुआ दिल दोबारा बनता है
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बनता रहा बिगड़ता रहा उम्र-भर ये दिल
लेकिन तमाम उम्र ये पत्थर न बन सका
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