सरमद ख़ान के शेर
मुझे सुकूँ नहीं देती हैं अब तिरी यादें
अब इन दियों से बहुत तीरगी निकलती है
दरख़्त शब चराग़ और तीरगी
तुम्हारे बाद सब से दोस्ती हुई
दरख़्त टूटते पत्तों का दुख समझते हैं
उन्हें भी शामिल-ए-यारान-ए-ग़म किया जाए
वो जब भी रात को छत पर टहलने जाता है
बहुत झिझकते हुए चाँदनी निकलती है
तिरे बदन को छू रही थीं उँगलियाँ
हथेलियों में तेज़ रौशनी हुई
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टैग : रौशनी
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मैं पूरे दिन की थकन घर में ले के आया हूँ
उदासियो मुझे फिर ताज़ा-दम किया जाए
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