टी एन राज़ के शेर
जो ज़ख़्म जुदाई के दिए उन पे मिरी जाँ
सस्ता सा ही मरहम तू लगाने के लिए आ
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मेरी मसर्रतों का सबब बस यही तो है
मैं रिश्वतों के बीच में हाइल नहीं रहा
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पैसे का मोल-तोल है अब इश्क़ का नहीं
महबूब भी भरोसे के क़ाबिल नहीं रहा
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जब से बढ़ा है शहर में मौतों का सिलसिला
हमराह अपने रखता हूँ इक नौहागर को मैं
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जब से अकड़ के 'राज़' मैं पढ़ने लगा हूँ शे'र
मैं भी पढ़े लिखों में हूँ जाहिल नहीं रहा
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मक़्ता है तू ही 'राज़' की इस ताज़ा ग़ज़ल का
इस बार जो आए तो न जाने के लिए आ
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दिल लगी की बात ढलती उम्र में
'राज़' की सूरत तो देखा चाहिए
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