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पुस्तक: परिचय

ہ اخبار الصنادید کی دوسری جلد ہے اس میں مصنف نے نواب سید محمد سعید خان بہادر ابن نواب سید محمد خان بہادر سے لیکر نواب سر سید محمد حامد علی خان بہادر کی مسند نشینی تک کے حالات بیان کئے ہیں ۔اسی کے ساتھ ساتھ اس دور کے محکموں اور کارناموں کا تفصیلی جائزہ لیا ہے ۔ اور خاتمہ کتاب میں ریاست رامپور کے احوال اور اس کا جغرافیہ،صنعت و حرفت ، اقوام و اہل خاندان ریاست کے اعزاز و مراسم اور ان کے دستوروں کو بہت ہی مفصل انداز میں بیان کیا ہے ۔ اس لئے افاغنہ و روہیلہ اور خوانین علاقہ روہیلہ کی مکمل جانکاری کے لئے یہ کتاب مکمل انسائکلوپیڈیا کا درجہ رکھتی ہے ۔

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लेखक: परिचय

पहचान: प्रसिद्ध इतिहासकार, छंदशास्त्र और भाषा विज्ञान के विशेषज्ञ, कुशल चिकित्सक, उच्च स्तरीय शोधकर्ता और कवि।

उर्दू साहित्य और उपमहाद्वीप के शैक्षणिक इतिहास में मौलवी हकीम मोहम्मद नजमुल गनी खाँ रामपुरी (तखल्लुस: नजमी) एक ऐसी बहुमुखी प्रतिभा के रूप में उभरते हैं, जिनका शैक्षणिक योगदान इतिहास लेखन, छंदशास्त्र (अरूज़), यूनानी चिकित्सा, भाषा विज्ञान और कविता तक फैला हुआ है। 8 अक्टूबर 1859 को रामपुर रियासत के एक उच्च शैक्षणिक परिवार में जन्मे इस संत स्वभाव के विद्वान ने अपने 82 वर्ष के जीवन में वे महान कार्य किए, जिनकी मिसाल आधुनिक युग में मिलना कठिन है। आपका परिवार पीढ़ियों से न्यायशास्त्र (फिक्ह), सूफीवाद और लेखन के लिए समर्पित था।

हकीम नजमुल गनी खाँ की प्रारंभिक शिक्षा राजस्थान के शैक्षणिक वातावरण में हुई, जिसके बाद उन्होंने रामपुर के प्रसिद्ध मदरसा-ए-आलिया से उच्च शिक्षा प्राप्त की। यहाँ उन्हें मौलाना अब्दुल हक खैराबादी जैसे महान शिक्षकों से ज्ञान प्राप्त करने का अवसर मिला और 1886 में उन्होंने 'दरस-ए-निज़ामी' में प्रथम स्थान प्राप्त किया। व्यावहारिक जीवन में वे यूनानी औषधालय के प्रभारी, रज़ा लाइब्रेरी के पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) और नवाब हामिद अली खान के दरबारी जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहे, लेकिन उनकी असली पहचान उनकी साहित्यिक सेवाएं बनीं।

उनकी विद्वत्ता को उनके समय के महान विद्वानों ने स्वीकार किया। ख्वाजा हसन निजामी ने उन्हें एक ऐसा शोधकर्ता और निडर इतिहासकार बताया, जिसने राजपुताना का इतिहास लिखकर औरंगजेब आलमगीर का ऐतिहासिक पक्ष मजबूती से रखा। उनकी इतिहासकारी का एक बड़ा चमत्कार उनकी रचना 'अखबार-उुस-सनादीद' है, जो रुहेलखंड और अफगानों के इतिहास पर एक प्रामाणिक दस्तावेज है। अल्लामा इकबाल ने इसे इतिहास का उत्कृष्ट नमूना बताते हुए उनकी सरल और प्रभावशाली लेखन शैली की बहुत प्रशंसा की।

इतिहास के साथ-साथ, छंदशास्त्र और कविता की कला पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि उनकी रचना 'बहरुल फसाहत' को उर्दू भाषा में इस विषय पर 'विश्वकोश' (एनसाइक्लोपीडिया) का दर्जा प्राप्त है। यह विशाल पुस्तक आज भी कविता सीखने वालों के लिए अंतिम शब्द मानी जाती है। इसके अलावा, हकीम साहब एक बेहतरीन यूनानी चिकित्सक भी थे। उनकी चिकित्सा संबंधी रचनाएँ जैसे 'खज़ानतुल अदविया' और 'ख्वासुल अदविया' चिकित्सकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं।

निधन: उन्होंने 82 वर्ष का भरपूर शैक्षणिक जीवन जिया और 1 जुलाई 1941 को रामपुर में उनका निधन हो गया।

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