Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

पुस्तक: परिचय

آٹھ کہانیوں پر مشتمل یہ کتاب"انار کلی " ایک عظیم مفکر ٹیگور کی فکر کا نتیجہ ہے۔ اصل کتاب بنگلہ میں ہے جس کا ترجمہ اردو میں کیا گیا ہے ۔ ہر کہانی میں ایک پیغام ہے۔ "انصاف " کے عنوان سے افسانہ میں ایک عورت سماجی رُت سے ہٹ کر جوانی کی راتیں گزارتی ہیں تو بالآخر اس کا انجام کیا ہوتا ہے،اسی کو دکھایا گیا ہے۔ اس کی چوتھی کہانی "انار کلی " کے نام سے کتاب موسوم کی گئی ہے۔ اس میں نہ صرف یہ بتایا گیا ہے کہ مشہور انار کلی کی حقیقت کیا ہے بلکہ اس کتاب کی کہانی میں انار کلی کے نام سے ایک نئی شاندار کہانی بھی شامل کی گئی ہے۔ کتاب کی تمام کہانیوں میں جملوں کا معیار بلند ،اسلوب اعلیٰ اور لہجہ پُرکشش ہے ۔ کہانی بیان کرنے میں جہاں پر منظر بدل رہا ہے اسے عدد نمبر سے ظاہر کیا گیا ہے۔ ہر کہانی دلچسپ اور شاندار ہے۔

.....और पढ़िए

लेखक: परिचय

पहचान: बंगाली भाषा के महान कवि, लेखक, दार्शनिक, कहानीकार, उपन्यासकार, शिक्षाविद और नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विश्व-स्तरीय व्यक्तित्व।

रवीन्द्रनाथ टैगोर (जिनका मूल नाम रवीन्द्रनाथ ठाकुर था; टैगोर दरअसल ठाकुर का ही बदला हुआ रूप है) बंगाली साहित्य के सबसे बड़े स्तंभ माने जाते हैं। वे एक बहुआयामी रचनाकार थे, जिन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, संगीत, दर्शन, शिक्षा और सांस्कृतिक चिंतन के माध्यम से विश्व स्तर पर गहरी छाप छोड़ी।

रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने वहीं प्राप्त की। उनकी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण यह है कि केवल 17 वर्ष की आयु में उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हो गई। 1878 में वे कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए, लेकिन लगभग डेढ़ वर्ष बाद बिना डिग्री लिए लौट आए। इसके बाद उन्होंने स्वयं अध्ययन, लेखन और आत्म-विकास को ही अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। इसी समय उन्होंने कहानियाँ लिखीं और कविता को अपनी मुख्य रचनात्मक पहचान बनाया।

टैगोर ने अपनी अधिकांश रचनाएँ बंगाली भाषा में लिखीं। 1901 में उन्होंने बंगाल के बोलपुर में शांतिनिकेतन की स्थापना की, जो पूर्व और पश्चिम के दर्शन के समन्वय पर आधारित एक अनोखा शिक्षाकेंद्र था। 1921 में यह विश्व-भारती विश्वविद्यालय बना। शांतिनिकेतन में ही टैगोर ने अपनी कई बंगाली रचनाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया, जिससे उनकी ख्याति यूरोप और अमेरिका तक फैल गई।

उर्दू साहित्य पर भी टैगोर का गहरा प्रभाव पड़ा। उनकी कविताओं, कहानियों, उपन्यासों और नाटकों के उर्दू अनुवादों ने उर्दू पाठकों को उनके विचार और कला से परिचित कराया। नियाज़ फ़तेहपुरी, फ़िराक़ गोरखपुरी, हामिद हसन क़ादरी, अब्दुल अज़ीज़ ख़ालिद, एम. ज़ियाुद्दीन और बाद में सुहैल अहमद फ़ारूक़ी, एम. अली और फ़हीम अनवर जैसे अनुवादकों ने इस संबंध को मजबूत किया।

प्रेमचंद, जोश मलीहाबादी, मजनूँ गोरखपुरी, सज्जाद ज़हीर और नियाज़ फ़तेहपुरी जैसे कई बड़े उर्दू लेखक और कवि टैगोर से प्रभावित दिखाई देते हैं। उनकी कविता में भारतीय संस्कृति, प्रकृति, मिट्टी, ऋतुएँ और मानवीय भावनाएँ इतनी व्यापक रूप में मिलती हैं कि हर भाषा का पाठक उनसे जुड़ जाता है।

टैगोर ने यूरोप, जापान, चीन, रूस और अमेरिका की यात्राएँ कीं और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर व्याख्यान दिए। 1913 में उनकी प्रसिद्ध कृति गीतांजलि पर उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला और वे साहित्य में नोबेल पाने वाले पहले एशियाई बने। 1915 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें “सर” की उपाधि दी, लेकिन जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में उन्होंने यह उपाधि लौटा दी—जो उनके नैतिक साहस का प्रतीक है।

जीवन के अंतिम वर्षों में टैगोर ने लगभग पूरी सभ्य दुनिया की यात्रा की। 1930 में उन्होंने लंदन में “मनुष्य का धर्म” शीर्षक से महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने 68 वर्ष की आयु के बाद चित्रकला शुरू की और न्यूयॉर्क सहित कई स्थानों पर उनकी चित्र-प्रदर्शनियाँ लगीं। उन्होंने लगभग तीन हज़ार गीतों की रचना की, असंख्य कविताएँ, कहानियाँ और कई नाटक लिखे। भारत की अनेक विश्वविद्यालयों और ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की। उनकी महान रचनात्मकता के कारण उन्हें “बंगाली भाषा का शेक्सपीयर” भी कहा जाता है।

शांतिनिकेतन टैगोर के जीवन का केंद्र रहा। वहीं उनकी पत्नी, दो बच्चों और बाद में उनके पिता (1905) का निधन हुआ। आर्थिक रूप से उन्हें त्रिपुरा के महाराजा से मासिक सहायता मिलती थी। संस्था को जीवित रखने के लिए उन्होंने पारिवारिक गहने, पुरी का एक मकान बेचा और पुस्तकों की रॉयल्टी से भी सहयोग किया। इस त्याग और दृढ़ता ने शांतिनिकेतन को एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा-केंद्र बना दिया। 1934 के बाद उनका स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिरने लगा।

निधन: 7 अगस्त 1941 को कलकत्ता में उनका निधन हुआ।

.....और पढ़िए
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

लेखक की अन्य पुस्तकें

लेखक की अन्य पुस्तकें यहाँ पढ़ें।

पूरा देखिए

लोकप्रिय और ट्रेंडिंग

सबसे लोकप्रिय और ट्रेंडिंग उर्दू पुस्तकों का पता लगाएँ।

पूरा देखिए
बोलिए