Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

पुस्तक: परिचय

مرزا عبد القادر بیدل ہندوستان میں فارسی زبان کے مشہور ترین شعرا میں سے ایک ہیں۔ بیدِل سخن فہمی و سخن سنجی کی خُداد اد و غیر معمولی صلاحیت رکھتے تھے. بیدل نے کم و بیش معاشرے کے ہر موضوع پر شعر کہے ہیں اور مشرق کی تاریخ و تہذیب پر ان کی نظر سب سے جدا ہےانہوں نے پسے ہوئے طبقات کے ہر پہلوکو موضوع بنایا اور اپنی فکری تہذیبی وابستگی کے ساتھ شعر کہے۔ بد قسمتی سے بر صغیر میں بیدل کو محض ایک خانقاہی شاعر بنا کر رکھ دیا گیا۔ بھلے بیدل کی شاعری کا ایک بڑا حصہ وحدت الوجودی ہے لیکن انہوں نے وحدت الوجود میں بھی انسان کی عظمت کا اثبات کیا ہے ان کی وجودی فکر ہمارے تمام کلاسیک اردو فارسی اور پنجابی شعرا سے مختلف ہی نہیں بلکہ فنی و فکری تہذیبی رچاو میں بیدل یگانہ روزگار ہیں ،زیر نظر کتاب بید ل کا فارسی دیوان ہے ، اس دیوان کو فارسی ادب میں گلستان سعدی ، مثنوی معنوی اور دیوان حافظ کے برابر اہمیت دی جاتی ہے۔

.....और पढ़िए

लेखक: परिचय

पहचान: प्रसिद्ध फ़ारसी कवि, सूफ़ी चिंतक, सब्क-ए-हिंदी के सबसे बड़े प्रतिनिधि कवि और “अबुल-मआनी” के नाम से विख्यात

मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल, जिन्हें बेदिल देहलवी और बेदिल अज़ीमाबादी के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म 1644 ईस्वी (1054 हिजरी) में अज़ीमाबाद (वर्तमान पटना, भारत) में हुआ। उनका संबंध चगताई नस्ल के प्रतिष्ठित बरलास क़बीले से था, जिसके पूर्वज मूलतः मावराउन्नहर के ऐतिहासिक नगर बुख़ारा के निवासी थे और बाद में भारत आकर बस गए थे। उनके पिता मिर्ज़ा अब्दुल ख़ालिक एक पूर्व तुर्क सैनिक थे।

बेदिल बचपन में ही माता-पिता के साये से वंचित हो गए। पिता का निधन तब हुआ जब उनकी आयु साढ़े चार वर्ष थी, जबकि छह वर्ष की आयु में उनकी माता भी चल बसीं। इसके बाद उनके चाचा मिर्ज़ा क़लंदर ने उनका पालन-पोषण किया। उन्होंने बेदिल को पारंपरिक शिक्षा के बजाय अध्ययन, चिंतन और विद्वानों व सूफ़ियों की संगति का अवसर प्रदान किया, जिसने उनकी असाधारण बौद्धिक और आध्यात्मिक व्यक्तित्व की नींव रखी।

बेदिल ने फ़ारसी साहित्य के महान आचार्यों, विशेषकर रूदकी, अमीर ख़ुसरो और जामी की रचनाओं का गहन अध्ययन किया। वे केवल कवि ही नहीं थे, बल्कि दर्शन, सूफ़ीवाद, चिकित्सा, ज्योतिष, जफ़्र, रमल, संगीत और इतिहास जैसे अनेक विषयों के भी ज्ञाता थे। उनकी कविता में गहन चिंतन, अर्थ-वैभव, दार्शनिक दृष्टि और आध्यात्मिक अनुभूति का अद्भुत संगम मिलता है। इसी कारण उन्हें फ़ारसी कविता में सब्क-ए-हिंदी का सबसे बड़ा प्रतिनिधि कवि माना जाता है।

बेदिल ने अपने जीवन का अधिकांश समय दिल्ली में बिताया, जहाँ उनकी महफ़िलें विद्वानों, सूफ़ियों, कवियों और बुद्धिजीवियों का केंद्र थीं। उनके व्यक्तित्व में ज्ञान, अध्यात्म, विनम्रता और उच्च नैतिकता का ऐसा समन्वय था कि विरोधी भी उनकी संगति से प्रभावित हो जाते थे। मुग़ल सम्राट औरंगज़ेब आलमगीर सहित उस दौर के अनेक शासक और प्रभावशाली लोग उनके काव्य के प्रशंसक थे, लेकिन बेदिल ने कभी दरबारी कविता या प्रशस्ति-लेखन को नहीं अपनाया।

उनकी प्रमुख कृतियों में दीवान-ए-बेदिल, चहार उनसुर, इरफ़ान, तिलिस्म-ए-हैरत, मुहीत-ए-आज़म, तूर-ए-मआरिफ़त तथा अनेक मसनवियाँ शामिल हैं। उनका साहित्य फ़ारसी काव्य में दार्शनिक और सूफ़ियाना चिंतन का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। भारतीय उपमहाद्वीप, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया में उनके काव्य का गहरा प्रभाव पड़ा। अल्लामा इक़बाल भी उनके वैचारिक महत्व के प्रशंसक थे, जबकि मिर्ज़ा ग़ालिब ने उनके काव्य-शिल्प से विशेष प्रेरणा ग्रहण की।

निधन: मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल का निधन 1720 ईस्वी में दिल्ली में हुआ। उनकी अंतिम विश्रामस्थली दिल्ली में पुराना क़िला के सामने, मथुरा रोड पर, मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम के निकट स्थित है, जिसे “बाग़-ए-बेदिल” (Garden of Bedil) कहा जाता है।

.....और पढ़िए
For any query/comment related to this ebook, please contact us at haidar.ali@rekhta.org

लेखक की अन्य पुस्तकें

लेखक की अन्य पुस्तकें यहाँ पढ़ें।

पूरा देखिए

लोकप्रिय और ट्रेंडिंग

सबसे लोकप्रिय और ट्रेंडिंग उर्दू पुस्तकों का पता लगाएँ।

पूरा देखिए
बोलिए