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रद करें डाउनलोड शेर

लेखक : अली अब्बास हुसैनी

प्रकाशक : एजुकेशनल बुक हाउस, अलीगढ़

प्रकाशन वर्ष : 1987

भाषा : उर्दू

श्रेणियाँ : पाठ्य पुस्तक, शोध एवं समीक्षा

उप श्रेणियां : फ़िक्शन, नॉवेल / उपन्यास तन्क़ीद

पृष्ठ : 385

सहयोगी : अंजुमन तरक़्क़ी उर्दू (हिन्द), देहली

Urdu Novel Ki Tareekh Aur Tanqeed
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पुस्तक: परिचय

اس کتاب میں ناول کی تاریخ اور اس کا پس منظر بیان کیا گیا ہے ۔ خاص طور پر انگریزی زبان کے ناول اور ان کے احوال کو بہت ہی تفصیل سے لکھا گیا ہے۔ جبکہ اردو کے ناول پر کم لکھا گیاہے کیونکہ اردو زبان میں ناول انگریزی زبان سے ہی منتقل ہوئی ہے اس لئے اگر منبع کی تلاش کرنا ہے تو جڑ پر گفتگو ضروری ہوتی ہے اسی لئے انگریزی کے ناولوں پر سیر حاصل بحث کی گئی ہے تاکہ ہم ناول کی تاریخ اس کے ابتدا اور ترقی و ترویج پر کچھ وثوق سے بول سکیں ۔ اس میں سب سے پہلے ناول کے ابتدا کے بارے میں پھر ناول کی تعریف ،انگریزی زبان کی وسعت ،اردو کے عناصر ترکیبی ، رتن ناتھ سرشار، عبد الحلیم ، سجاد حسین ، منشی پریم چند ، اور دیگر عنوانوں کے تحت اردو ناول کی تاریخ اور اس کے تنقیدی رجہان پر بحث کی گئی ہے ۔ اردو ناول کی تاریخ اور تنقیدی شعور کا مطالعہ کرنے والے اس کتاب کو ضرور پڑھنا پسند کرینگے ۔

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लेखक: परिचय

पहचान: प्रख्यात कहानीकार, उपन्यासकार और समीक्षक

अली अब्बास हुसैनी 3 फरवरी 1897 को मौजा पारा, जिला गाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) में पैदा हुए। उनके पिता का नाम सैयद मोहम्मद सालेह था। प्रारंभिक शिक्षा मदरसा सुलेमानिया पटना में हुई जहाँ उन्होंने अरबी और धर्मशास्त्र (दीनियात) की शिक्षा पाई, फिर मुहम्मडन स्कूल पटना की छठी कक्षा में उनका दाखिला करा दिया गया। बीमार पड़ने पर वे गाज़ीपुर चले गए और वहाँ जर्मन मिशन स्कूल की सातवीं कक्षा में दाखिल हुए, बाद में इलाहाबाद में दो साल तक शिक्षा पाने के बाद 1915 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। 1917 में क्रिश्चियन कॉलेज से इंटरमीडिएट करने के बाद 1919 में कैनिंग कॉलेज से बीए की डिग्री हासिल की। 1921 में टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज इलाहाबाद से एल.टी. किया और 1924 में प्राइवेट तौर पर इतिहास (हिस्ट्री) में एम.ए. की डिग्री हासिल की।

अली अब्बास हुसैनी 28 जुलाई 1921 को गवर्नमेंट हाई स्कूल रायबरेली में अंग्रेज़ी और इतिहास के शिक्षक नियुक्त हो गए। रायबरेली में अली अब्बास हुसैनी का निवास पाँच वर्ष रहा और 1927 में तरक्की पाकर उनका तबादला लखनऊ के हवेली कॉलेज में हो गया। बारह वर्ष हवेली कॉलेज में गुज़ारने के बाद हुसैनी कानपुर चले गए जहाँ से फिर तरक्की पाकर 1941 में हुसैन आबाद इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल हो गए। इस तरह शिक्षा विभाग में 37 साल गुज़ार कर 30 जून 1954 को प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत्त हुए।

अली अब्बास हुसैनी की गिनती उर्दू कहानी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और शानदार प्रेमचंद स्कूल के यथार्थवादी (हकीकतपसंद) कहानीकार के रूप में होती है। वे मुख्य रूप से यथार्थवाद के समर्थक थे और पश्चिमी फिक्शन पर गहरी नज़र रखने के कारण उनके यहाँ कहानी कहने का बेहतरीन सलीका मिलता है। उनकी आलोचना किसी खास विचारधारा के तहत नहीं बल्कि आज़ाद रही, और उन्होंने नाटक, आलोचनात्मक लेख और उपन्यास लेखन में भी हाथ आज़माया। उनके यहाँ मानवीय सहानुभूति, शराफत, शर्मो-हया और संवेदनशीलता के तत्व प्रमुख हैं। वे निचले तबके की महिलाओं की समस्याओं और स्वाभाविक व मनोवैज्ञानिक भावनाओं को अपनी कहानियों का विषय बनाते थे।

उनकी मुख्य उर्दू किताबों में दो उपन्यास "सर सैयद अहमद पाशा या काफ़ की परी" और "शायद कि बहार आई" शामिल हैं। उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रहों में "बासी फूल", "आई.सी.एस.", "रफ़ीक़-ए-तन्हाई", "हमारा गाँव" और "मेला घूमनी" शामिल हैं, जिनमें 'मेला घूमनी' सबसे ज़्यादा मशहूर है। उनकी चुनिंदा कहानियों में "बूढ़ा और बाला", "बहू की जिंसी", "रफ़ीक़-ए-तन्हाई" और महिलाओं की समस्याओं पर आधारित "चहार टोली" खास तौर पर देखे जाते हैं। फिक्शन के अलावा उन्होंने उर्दू उपन्यास की कला और विकास पर एक बेहतरीन किताब "उर्दू नाविल की तारीख और तनक़ीद" भी लिखी जो बहुत मशहूर है। अली अब्बास हुसैनी की कहानियों का समग्र संग्रह (कुलियात) दो बड़े खंडों में नंद किशोर विक्रम ने संपादित किया है।

निधन: 27 सितंबर 1969 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।

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