बरगश्ता और वो बुत-ए-बे-पीर हो न जाए

यगाना चंगेज़ी

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यगाना चंगेज़ी

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    रोचक तथ्य

    1912

    बरगश्ता और वो बुत-ए-बे-पीर हो जाए

    उल्टी कहीं दुआओं की तासीर हो जाए

    दिल जल के ख़ाक हो तो फिर इक्सीर हो जाए

    जाँ-सोज़ हों जो नाले तो तासीर हो जाए

    किस सादगी से मुजरिमों ने सर झुका लिया

    महजूब क्यूँ वो मालिक-ए-तक़दीर हो जाए

    दस्त-ए-दुआ' तक उठ सके फ़र्त-ए-शर्म से

    यारब किसी से ऐसी भी तक़्सीर हो जाए

    मस्तों की ठोकर और मिरा सर है साक़िया

    दुश्मन किसी का यूँ फ़लक-ए-पीर हो जाए

    उठने ही को है बीच से पर्दा हिजाब का

    महफ़िल तमाम आलम-ए-तस्वीर हो जाए

    ग़फ़लत कीजियो कभी क़ातिल की याद में

    दिल कोई कमी तह-ए-शमशीर हो जाए

    बैठा है लौ लगाए कोई तेग़-ए-नाज़ से

    क़ातिल किसी के काम में ताख़ीर हो जाए

    जल्दी सुबू को तोड़ के साग़र बना ले अब

    साक़ी इस अम्र-ए-ख़ैर में ताख़ीर हो जाए

    नालों ने ज़ोर बाँधा है फिर पिछली रात से

    चर्ख़ चलते चलते कोई तीर हो जाए

    दिल से बहुत शिकायतें करते हो यार की

    देखो क़लम से कुछ कभी तहरीर हो जाए

    सैर-ए-चमन से दिल लगाओ चले चलो

    फ़स्ल-ए-बहार पाँव की ज़ंजीर हो जाए

    अंजाम-कार पर नहीं कुछ इख़्तियार 'यास'

    तक़दीर से ख़जिल मिरी तदबीर हो जाए

    स्रोत :
    • पुस्तक : Kulliyat-e-Yagana (पृष्ठ 161)
    • रचनाकार : Meerza Yagana Changezi Lukhnawi
    • प्रकाशन : Farib Book Depot (P) Ltd. (2005)
    • संस्करण : 2005

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