बरते कुछ इम्तियाज़ तो इंसान कम से कम

सय्यद ज़ियाउद्दीन नईम

बरते कुछ इम्तियाज़ तो इंसान कम से कम

सय्यद ज़ियाउद्दीन नईम

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    बरते कुछ इम्तियाज़ तो इंसान कम से कम

    हो अपने दोस्तों की तो पहचान कम से कम

    अहल-ए-ग़रज़ किसी के हुए हैं जो हों मिरे

    इतना तो सोच दिल-ए-नादान कम से कम

    होगा यही बहुत से बहुत जाँ से जाएँगे

    रह जाएगी वफ़ा की मगर आन कम से कम

    चलिए मोआ'मला ये किसी सम्त तो हुआ

    कम तो हुआ ये रोज़ का ख़लजान कम से कम

    ऐसा नहीं कि माया-ए-एहसास भी हो

    इतने नहीं हैं बे-सर-ओ-सामान कम से कम

    ना-मुम्किनात में से तो शायद हो 'नईम'

    आमद बहार की नहीं आसान कम से कम

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