दर्द समझे न कोई दर्द का दरमाँ समझे

बख़्तियार ज़िया

दर्द समझे न कोई दर्द का दरमाँ समझे

बख़्तियार ज़िया

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    दर्द समझे कोई दर्द का दरमाँ समझे

    लोग वहशत को इलाज-ए-ग़म-ए-दौराँ समझे

    दिल पे क्या गुज़री अचानक तिरे जाने से

    इस नज़ाकत को भला क्या कोई मेहमाँ समझे

    अर्श-ओ-कुर्सी से परे रखते हैं जो लांगह-ए-फ़िक्र

    मंज़र-ए-दहर को हम रौज़न-ए-ज़िंदाँ समझे

    वो भड़कते हुए शो'ले थे नशेमन के मिरे

    दूर से आप जिन्हें सर्व-ए-चराग़ाँ समझे

    यूँ भी हालात से समझौता किया है अक्सर

    दुश्मन-ए-जाँ को भी हम अपना निगहबाँ समझे

    स्रोत :
    • पुस्तक : Shab Charagh (पृष्ठ 67)
    • रचनाकार : Bakhtiyar Ziya
    • प्रकाशन : Markaz-e-adab (1993)
    • संस्करण : 1993

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