फ़ुग़ान-ओ-आह है हर-दम पुकार रखता है
फ़ुग़ान-ओ-आह है हर-दम पुकार रखता है
ग़ज़ब में जान दिल-ए-बे-क़रार रखता है
गुल-ए-चमन न दुर-ए-शाहवार रखता है
भरा भरा जो बदन मेरा यार रखता है
लतीफ़ रूह की मानिंद जिस्म है किस का
पियादा कौन वक़ार-ए-सवार रखता है
जुदा जुदा है हसीनान-ए-दहर का अंदाज़
हर एक तरह की हर गुल बहार रखता है
फ़रेब-ए-हुस्न से अल्लाह आदमी को बचा
चले ये पेच तो रुस्तम को मार रखता है
कमाल-ए-इश्क़ को पाता हूँ ख़ाकसारी में
तरफ़ नशेब के दरिया गुज़ार रखता है
बहार आई है बिंत-उल-इनब पे जोबन है
गिरह में दाम कोई बादा-ख़्वार रखता है
सुना है जब से कि हैं दफ़न उस में आशिक़-ए-ज़ार
क़दम ज़मीं पे नहीं वो निगार रखता है
हर एक शीशा-ए-साअ'त फ़लक को कहता है
कि 'मुंतही' से सरासर ग़ुबार रखता है
- रचनाकार : मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही
- प्रकाशन : मतबा यूसुफ़ी, दिल्ली
- संस्करण : 1895
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.