हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

मीर तक़ी मीर

हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

मीर तक़ी मीर

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    हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

    अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं

    इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा

    इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मस्जूद जानते हैं

    सूरत-पज़ीर हम बिन हरगिज़ नहीं वे माने

    अहल-ए-नज़र हमीं को मा'बूद जानते हैं

    इश्क़ उन की अक़्ल को है जो मा-सिवा हमारे

    नाचीज़ जानते हैं ना-बूद जानते हैं

    अपनी ही सैर करने हम जल्वा-गर हुए थे

    इस रम्ज़ को व-लेकिन मादूद जानते हैं

    यारब कसे है नाक़ा हर ग़ुंचा इस चमन का

    राह-ए-वफ़ा को हम तो मसदूद जानते हैं

    ये ज़ुल्म-ए-बे-निहायत दुश्वार-तर कि ख़ूबाँ

    बद-वज़इयों को अपनी महमूद जानते हैं

    क्या जाने दाब सोहबत अज़ ख़्वेश रफ़्तगाँ का

    मज्लिस में शैख़-साहिब कुछ कूद जानते हैं

    मर कर भी हाथ आवे तो 'मीर' मुफ़्त है वो

    जी के ज़ियान को भी हम सूद जानते हैं

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    अहमद महफ़ूज़

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    हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं अहमद महफ़ूज़

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