जिस जगह जो ख़ुश-नशीं आया नज़र रहने दिया

अब्दुस्सलाम आसिम

जिस जगह जो ख़ुश-नशीं आया नज़र रहने दिया

अब्दुस्सलाम आसिम

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    जिस जगह जो ख़ुश-नशीं आया नज़र रहने दिया

    हम ने रौशन-दान में चिड़ियों का घर रहने दिया

    मिल के जो बिछड़े उन्हें जाने से रोका भी नहीं

    और जो साथ आए उन को हम-सफ़र रहने दिया

    जिस के डर की करते फिरते हैं तिजारत अहल-ए-दीं

    हम ने उस के ख़ौफ़ से लर्ज़ीदा शर रहने दिया

    दर्द-ए-दिल को भी दवाओं से ही बहलाते रहे

    बद-दुआओं को हमेशा बे-असर रहने दिया

    हर सहर तुझ को भुलाने के लिए दफ़्तर गया

    और तिरी यादों को मेहमाँ रात भर रहने दिया

    जिस में हाथों को मिरे थामे नज़र आते हो तुम

    बस उसी तस्वीर को दीवार पर रहने दिया

    सब बदल कर रख दिया हम ने इन आँखों के लिए

    हाँ मगर मंज़र-ब-मंज़र चश्म-ए-तर रहने दिया

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