कुछ और रंग मैं तरतीब-ए-ख़ुश्क-ओ-तर करता

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

कुछ और रंग मैं तरतीब-ए-ख़ुश्क-ओ-तर करता

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

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    कुछ और रंग मैं तरतीब-ए-ख़ुश्क-ओ-तर करता

    ज़मीं बिछा के हवा ओढ़ के बसर करता

    गुल शगुफ़्त को आपस में दस्तरस देता

    और आइने के लिए आइना सिपर करता

    चराग़-ए-कोहना हटाता फ़सील-ए-मुर्दा से

    गियाह-ए-ख़ाम पे शबनम दबीज़-तर करता

    वो नीम नान-ए-ख़ुनुक आब और सग-ए-हम-नाम

    मैं ज़ेर-ए-सब्ज़-शजर अपना मुस्तक़र करता

    वो जिस से शहर की दीवार बे-नविश्ता है

    मैं उस की शाख़-ए-तहय्या को बे-समर करता

    मैं चूमता हुआ इक अहद-नामा-ए-मंसूख़

    किसी क़दीम समुंदर में रहगुज़र करता

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