लज़्ज़त-ए-वस्ल मुख़्तसर मत रख

रियाज़ हनफ़ी

लज़्ज़त-ए-वस्ल मुख़्तसर मत रख

रियाज़ हनफ़ी

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    लज़्ज़त-ए-वस्ल मुख़्तसर मत रख

    शब की तक़दीर में सहर मत रख

    आग करती नहीं किसी का लिहाज़

    बाँस के जंगलों में घर मत रख

    रिज़्क़ भी बे-सबब नहीं मिलता

    अपने बच्चों को बे-हुनर मत रख

    तुझ को सहरा में रक़्स करना है

    पाँव से बाँध कर भँवर मत रख

    ग़ैर मुमकिन नहीं फ़लक की सैर

    ना-उमीदी को हम-सफ़र मत रख

    तुझ को सोना है क़ब्र में अपनी

    मेरे आ'माल पर नज़र मत रख

    गुफ़्तुगू चल रही है तारों से

    शाम की आँख में सहर मत रख

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