लुत्फ़ ये है जिसे आशोब-ए-जहाँ कहता हूँ

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

लुत्फ़ ये है जिसे आशोब-ए-जहाँ कहता हूँ

ग़ुलाम रब्बानी ताबाँ

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    लुत्फ़ ये है जिसे आशोब-ए-जहाँ कहता हूँ

    उसी ज़ालिम को फ़रोग़-ए-दिल-ओ-जाँ कहता हूँ

    ग़ैर का ज़िक्र ही क्या मुफ़्त में इल्ज़ाम दो

    दिल की हर बात मैं तुम से भी कहाँ कहता हूँ

    किसी मजबूर के होंटों पे जो जाता है

    उस तबस्सुम को मैं ए'जाज़-ए-फ़ुग़ाँ कहता हूँ

    मैं ज़िंदानी-ए-सहरा असीर-ए-गुलशन

    कोई बंदिश हो उसे जी का ज़ियाँ कहता हूँ

    दिल शिकस्ता सही मायूस नहीं हूँ दोस्त

    मैं कि हर दौर को दौर-ए-गुज़राँ कहता हूँ

    हुस्न का शेवा-ए-पैमाँ-शिकनी अच्छा है

    फिर भी हर साँस को चश्म-ए-निगराँ कहता हूँ

    कोई हद है मिरी आशुफ़्ता-सरी की 'ताबाँ'

    उन की ज़ुल्फ़ों को चराग़ों का धुआँ कहता हूँ

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