मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते

यगाना चंगेज़ी

मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते

यगाना चंगेज़ी

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    मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते

    बुतों को सज्दा भी करते तो क़िबला-रू करते

    कभी परवरिश-ए-नख़्ल-ए-आरज़ू करते

    नुमू से पहले जो अंदेशा-ए-नुमू करते

    सुनें दिल से तो फिर क्या पड़ी थी ख़ारों को

    कि गुल को महरम-ए-अंजाम-ए-रंग-ओ-बू करते

    गुनाह था भी तो कैसा गुनाह-बे-लज़्ज़त

    क़फ़स में बैठ के क्या याद-ए-रंग-ओ-बू करते

    बहाना चाहती थी मौत बस था अपना

    कि मेज़बानी-ए-मेहमान-ए-हीला-ए-जु करते

    दलील-ए-राह दिल-ए-शब चराग़ था तन्हा

    बुलंद-ओ-पस्त में गुज़री है जुस्तुजू करते

    अज़ल से जो कशिश-ए-मरकज़ी के थे पाबंद

    हवा की तरह वो क्या सैर चार-सू करते

    फ़लक ने भूल-भुलय्यों में डाल रक्खा था

    हम उन को ढूँडते या अपनी जुस्तुजू करते

    असीर-ए-हाल मुर्दों में हैं ज़िंदों में

    ज़बान कटती है आपस में गुफ़्तुगू करते

    पनाह मिलती उम्मीद-ए-बे-वफ़ा को कहीं

    हवस-नसीब अगर तर्क-ए-आरज़ू करते

    स्रोत :
    • पुस्तक : Kulliyat-e-Yagana (पृष्ठ 301)
    • रचनाकार : Meerza Yagana Changezi Lukhnawi
    • प्रकाशन : Farib Book Depot (P) Ltd. (2005)
    • संस्करण : 2005

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