रह-ए-इरफ़ाँ में अपने होश को माइल समझते हैं

हफ़ीज़ फ़ातिमा बरेलवी

रह-ए-इरफ़ाँ में अपने होश को माइल समझते हैं

हफ़ीज़ फ़ातिमा बरेलवी

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    रह-ए-इरफ़ाँ में अपने होश को माइल समझते हैं

    हुई जब बे-ख़ुदी तारी उसे मंज़िल समझते हैं

    वुफ़ूक़-ए-शौक़ को है तंग अक़्सा-ए-दो-आलम भी

    फ़ज़ा-ए-ला-मकाँ परवाज़ के क़ाबिल समझते हैं

    बक़ा ज़ाहिर में ज़र्रात-ए-अदम का इक हयूला है

    हक़ीक़त में फ़ना को ज़ीस्त का हासिल समझते

    ज़माने का असर होता नहीं है हाल पर अपने

    कि यकसाँ हालत-ए-माज़ी-ओ-मुस्तक़बिल समझते हैं

    स्रोत :
    • पुस्तक : Pathan Shayraat ka Tazkira (पृष्ठ 124)
    • रचनाकार : Khan Mohammad Atif
    • प्रकाशन : Khan Mohammad Atif (1983)
    • संस्करण : 1983

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