सहर क़रीब है ख़ल्वत महक रही होगी

हयात वारसी

सहर क़रीब है ख़ल्वत महक रही होगी

हयात वारसी

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    सहर क़रीब है ख़ल्वत महक रही होगी

    शराब साग़र-ए-ग़म से छलक रही होगी

    वो बात तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का जो सबब ठहरी

    वो बात तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का जो सबब ठहरी

    वो बात ख़ुद तिरे दिल में खटक रही होगी

    ये उजली शाम महकते हुए ये सन्नाटे

    वो अपने मुँह को दुपट्टे से ढक रही होगी

    मैं सुब्ह-ओ-शाम गुज़रता था जिस से बे-मक़्सद

    वो राह अब भी मिरी राह तक रही होगी

    क़लम है सदियों से मसरूफ़ हुस्न-कारी में

    सहर में तेरी अदा भी झलक रही होगी

    ये बात अलग है मैं राहों की जुस्तुजू में हूँ

    मिरी तलाश में मंज़िल भटक रही होगी

    'हयात' फिर महक उठी है याद माज़ी की

    हमारे गाँव में फिर फ़स्ल पक रही होगी

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