शाम की राह देखता हूँ मैं

फ़रहत एम हसनी

शाम की राह देखता हूँ मैं

फ़रहत एम हसनी

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    शाम की राह देखता हूँ मैं

    एक जलता हुआ दिया हूँ मैं

    तेरा कहना कि बेवफ़ा हूँ मैं

    अपनी नज़रों से गिर गया हूँ मैं

    मैं तुम्हें घर पे मिल नहीं सकता

    ख़ुद से मिलने कहीं चला हूँ मैं

    मत समझ मुझ को मोहसिन-ए-गिर्दाब

    एक कश्ती का ना-ख़ुदा हूँ मैं

    तेरी मंज़िल है रास्ता मेरा

    याद रख तेरा रहनुमा हूँ मैं

    सारी मख़्लूक़ मुझ पे हैराँ है

    कुछ फ़रिश्तों का रतजगा हूँ मैं

    एक बूढ़ा शजर ये कहता है

    कुछ परिंदों का आसरा हूँ मैं

    मेरी गोली ग़लत लगी तुम को

    दुश्मनों से नहीं मिला हूँ मैं

    साक़िया क़ाएदे सिखा मुझ को

    मय-कदे में अभी नया हूँ मैं

    जितने तेरे हैं चाहने वाले

    याद रख सब से ही सिवा हूँ में

    आबले पाँव में तो हैं 'फ़रहत'

    फिर भी मंज़िल तक गया हूँ मैं

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