शरार-ए-इश्क़ सदियों का सफ़र करता हुआ

कबीर अजमल

शरार-ए-इश्क़ सदियों का सफ़र करता हुआ

कबीर अजमल

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    शरार-ए-इश्क़ सदियों का सफ़र करता हुआ

    बुझा मुझ में मुझी को बे-ख़बर करता हुआ

    रुमूज़-ए-ख़ाक बाब-ए-मुश्तहर करता हुआ

    यूँही आबाद सहरा-ए-हुनर करता हुआ

    ज़मीन-ए-जुस्तुजू गर्द-ए-सफ़र करता हुआ

    ये मुझ में कौन है मुझ से मफ़र करता हुआ

    अभी तक लहलहाता है वो सब्ज़ा आँख में

    वो मौज-ए-गुल को मेयार-ए-नज़र करता हुआ

    हरीम-ए-शब में ख़ूँ रोता हुआ माह-ए-तमाम

    निगार-ए-सुब्ह क़िस्सा मुख़्तसर करता हुआ

    मिरी मिट्टी को ले पहुँचा दयार-ए-यार तक

    ग़ुबार-ए-जाँ तवाफ़-ए-चश्म-ए-तर करता हुआ

    तकब्बुर ले रहा है इम्तिहाँ फिर अज़्म का

    सितारों को मिरे ज़ेर-ए-असर करता हुआ

    फ़लक-बोसी की ख़्वाहिश ताइर-ए-वहशत को थी

    उड़ा है अपनी मिट्टी दरगुज़र करता हुआ

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