दाद-ख़्वाही

जुरअत क़लंदर बख़्श

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जुरअत क़लंदर बख़्श

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    फ़ैज़ाबाद में मिर्ज़ा मुहम्मद तक़ी तर्के के यहाँ मुशायरा होता था। वो शोअरा के साथ बुजु़र्गाना बरताव करते थे। मालूम होता है कि उन्होंने लखनऊ आकर भी ये रिवायत क़ाइम रखी। वहाँ एक मुशायरे में जुरअत भी आए और अपने शागिर्दों को साथ लाए। जुरअत के बारे में सय्यद अहमद अली यकता का कहना है कि वो जिस मुशायरे में जाते तो आधा मुशायरा, बल्कि इससे भी ज़्यादा उनके शागिर्दों से भर जाता। चुनांचे वो इस मुशायरे में भी अपने बहुत से शागिर्दों के साथ पहुंचे। ग़ज़लें सुनाईं और ख़ास-ओ-आम की तारीफों का वो ग़लग़ला उठा कि शे’र का समझना तो दरकिनार सुनना भी मुश्किल हो गया। मीर तक़ी मीर भी उस मुशायरे में मौजूद थे। जुरअत ने हिम्मत करके अपने को मीर के पहलू तक पहुंचाया और अपने शे’रों पर दाद ख़ाह हुए। मीर ने पहले तो कुछ कहने से पहलू तही की लेकिन जब जुरअत ने बेहद इसरार किया तो मीर बोले कि ये इतना इसरार करते हैं तो मजबूरन कहना पड़ता है कि (यहाँ क़ुदरत ने मीर का ये उर्दू जुमला लफ़्ज़ लफ़्ज़ नक़ल किया है) “कैफ़ियत उसकी ये है कि तुम शे’र तो कह नहीं जानते हो अपनी चूमा चाटी कह लिया करो।”

    (मुसन्निफ़ा अली जव्वाद ज़ैदी, तारीख़ मुशायरा, मतबूआ शान हिंद पब्लिकेशनज़,नई दिल्ली, सफ़ा नंबर111-12, इशाअत दोयम1992)

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