अबू शब्बर के शेर
एक तुम ही नहीं हो पास मिरे
वर्ना किस चीज़ की कमी है मुझे
इक तवज्जोह से उस की इस दिल में
मुद्दतों रौशनी सी रहती है
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मिट चुकी दिल से जब तिरी हर याद
फिर ज़रा सी कहाँ से आती है
लुटे हुए नवाब-ज़ादों का भरम भी ख़ूब था
रियासतें उजड़ गईं ग़ुरूर 'उम्र भर रहा
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टैग : इतिहास
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ज़ुल्मत-ए-फ़ित्ना-ए-यज़ीदी को
ख़ून-ए-इब्न-ए-'अली से ख़तरा है
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टैग : कर्बला
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