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आफ़ताब शाह आलम सानी

1728 - 1806 | दिल्ली, भारत

मुग़ल बादशाह जिन्होंने लाल क़िले और अपने दरबार में उर्दू शायरी का सिलसिला शुरू किया

मुग़ल बादशाह जिन्होंने लाल क़िले और अपने दरबार में उर्दू शायरी का सिलसिला शुरू किया

ग़ज़ल

आजिज़ हूँ तिरे हाथ से क्या काम करूँ मैं

फ़सीह अकमल

गो सुध नहीं उस शोख़ सितमगर ने सँभाली

फ़सीह अकमल

घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया

फ़सीह अकमल

जब वो नज़रें दो-चार होती हैं

फ़सीह अकमल

पाता नहीं हूँ और किसी काम से लज़्ज़त

फ़सीह अकमल

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI