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आफ़ताब शाह आलम सानी

1728 - 1806 | दिल्ली, भारत

मुग़ल बादशाह जिन्होंने लाल क़िले और अपने दरबार में उर्दू शायरी का सिलसिला शुरू किया

मुग़ल बादशाह जिन्होंने लाल क़िले और अपने दरबार में उर्दू शायरी का सिलसिला शुरू किया

ग़ज़ल 8

शेर 2

घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया

जी सीने से निकल गया दिल हात से गया

या साल माह था तू मिरे साथ या तो अब

बरसों में एक दिन की मुलाक़ात से गया

 

पुस्तकें 4

Ajaib-ul-Qisas

 

1965

Ajaib-ul-Qisas

Tanqidi Mutala

1987

Nadirat-e-Shahi

 

2006

Nadirat-e-Shahi

 

1944

 

ऑडियो 5

आजिज़ हूँ तिरे हाथ से क्या काम करूँ मैं

गो सुध नहीं उस शोख़ सितमगर ने सँभाली

घर ग़ैर के जो यार मिरा रात से गया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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