Ahmad Khayal's Photo'

अहमद ख़याल

1979

अहमद ख़याल के शेर

691
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

महकते फूल सितारे दमकता चाँद धनक

तिरे जमाल से कितनों ने इस्तिफ़ादा क्या

ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी

उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था

मैं था सदियों के सफ़र में 'अहमद'

और सदियों का सफ़र था मुझ में

ये भी तिरी शिकस्त नहीं है तो और क्या

जैसा तू चाहता था मैं वैसा नहीं बना

ऐन मुमकिन है कि बीनाई मुझे धोका दे

ये जो शबनम है शरारा भी तो हो सकता है

कोई हैरत है इस बात का रोना है हमें

ख़ाक से उट्ठे हैं सो ख़ाक ही होना है हमें

सुकूत तोड़ने का एहतिमाम करना चाहिए

कभी-कभार ख़ुद से भी कलाम करना चाहिए

तुम्हारी जीत में पिन्हाँ है मेरी जीत कहीं

तुम्हारे सामने हर बार हारता हुआ मैं

तू जो ये जान हथेली पे लिए फिरता है

तेरा किरदार कहानी से निकल सकता है

किसी दरवेश के हुजरे से अभी आया हूँ

सो तिरे हुक्म की तामील नहीं करनी मुझे

हवा के हाथ पे छाले हैं आज तक मौजूद

मिरे चराग़ की लौ में कमाल ऐसा था

वो ज़हर है फ़ज़ाओं में कि आदमी की बात क्या

हवा का साँस लेना भी मुहाल कर दिया गया

वो सर उठाए यहाँ से पलट गया 'अहमद'

मैं सर झुकाए खड़ा हूँ सवाल ऐसा था

दश्त में वादी-ए-शादाब को छू कर आया

मैं खुली-आँख हसीं ख़्वाब को छू कर आया

कोई तो दश्त समुंदर में ढल गया आख़िर

किसी के हिज्र में रो रो के भर गया था मैं

मेरे कश्कोल में डाल और ज़रा इज्ज़ कि मैं

इतनी ख़ैरात से आगे नहीं जाने वाला

बस चंद लम्हे पेश-तर वो पाँव धो के पल्टा है

और नूर का सैलाब सा इस आबजू में गया

वो दे रहा था तलब से सिवा सभी को 'ख़याल'

सो मैं ने दामन-ए-दिल और कुछ कुशादा किया

दिल किसी बज़्म में जाते ही मचलता है 'ख़याल'

सो तबीअत कहीं बे-ज़ार नहीं भी होती

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

बोलिए